तेज़सिंह : पहले तो हम लोगों को उस खोह में चलना चाहिए। वहां चलकर उस तिलिस्म को देखें जिसे तोड़ कर कोई दूसरा वह खज़ाना ले गया है, शायद वहां कुछ मिले या कोई निशान पाया जाये, इसके बाद जो कुछ सलाह होगी किया जायेगा। कुमार : अच्छा चलो, मगर इस वक़्त एक बात का खयाल और मेरे जी में आता है। तेज़सिंह : वह क्या? कुमार : जब बद्रीनाथ को क़ैद करने उस खोह में गये थे और दरवाज़ा न खुलने पर वापस आये, उस वक़्त भी शायद उस दरवाज़े को भीतर से उसी ने बन्द कर लिया हो जिसने उस तिलिस्म को तोड़ा है। वह उस वक़्त उसके अन्दर रहा होगा। तेज़सिंह : आपका खयाल ठीक है, ज़रूर यही बात है, इसमें कोई शक नहीं। बल्कि उसी ने शिवदत्त को भी छुड़ाया होगा। कुमार : हो सकता है, मगर जब छूटने पर शिवदत्त ने बेईमानी पर कमर बांधी और पीछे मेरे लश्कर पर धावा मारा तो क्या उसी ने फिर शिवदत्त को
तो मिल गईं, आठ पहल भी हुआ और नाप से 6 हाथ, 3 अंगुल भी है, यह देखिये, इस तरफ 5 का अंक भी दिखाई देता है, बाकी रह गया, ठीक नाप तोड़, सो कुमार के हाथ से इसका नाप भी ठीक हुआ,अब यही इसको तोड़ें!” कुंअर वीरेन्द्रसिंह ने उसी जगह से एक बड़ा भारी पत्थर (चूने का ढोंका) ले लिया जिसका मसाला सख्त और मजबूत था। इसी ढोंके को ऊंचा करके जोर से उस खंभे पर मारा जिससे वह खंभा हिल उठा, दो-तीन दफे में बिल्कुल कमजोर हो गया, तब कुमार ने बगल में दबाकर जोर दिया और जमीन से निकाल डाला। खंभा उखाड़ने पर उसके