ये चारों आदमी नीचे उतरे। वहां एक अंधेरी कोठरी में घूम-घूम कर इन लोगों को कोई दूसरा दरवाज़ा खोजना पड़ा मगर पता न लगा। लाचार होकर फिर बाहर निकल आये, लेकिन वह फटी हुई ज़मीन फिर न जुटी, उसी तरह खुली रह गयी। तेज़सिंह ने कहा, ‘‘मालूम होता है कि भीतर से बन्द करने की कोई युक्ति इसमें भी है जो हम लोगों को मालूम नहीं, खैर जो भी हो काम कुछ न निकला अब बिना बाहर की राह इस खोज में आये कोई मतलब सिद्ध नहीं होगा। चारों आदमी तिलिस्म के बाहर हुए। तेज़सिंह ने ताला बन्द कर दिया।* (*जिस चबूतरे पर पत्थर का आदमी सोया था उसके सिहराने की तरफ दो पत्थर रख कर ताला बन्द कर देते थे।। वही तिसिल्म का मुंह बन्द कर देना या ताला बन्द कर देना था, फिर कोई खोल नहीं सकता था।) एक रोज़ टिक कर कुंवर वीरेन्द्रसिंह ने फतहसिंह सेनापति को नायब मुकर्रर करके चुनार भेज देने के बाद नौगढ़ की तरफ कूच किया और वहां पहुंच
पकड़ो, वह मुंह खोल देगा, उसका मुंह काफूर से खूब भर दो, थोड़ी ही देर में वह भी गल के बह जायेगा, तब किताब ले लो। उसके सब पन्ने भोजपत्र के होंगे। जो कुछ उसमें लिखा हो वैसा करो। -विक्रम।” कुमार ने पढ़ा, सभी ने सुना। घंटे भर तक तो सिवाय तिलिस्म बनाने वाले की तारीफ के किसी की जुबान से दूसरी बात न निकली। बाद इसके यह राय ठहरी कि अब दिन भी थोड़ा रह गया है, डेरे में चलकर आराम किया जाय, कल सबेरे ही कुल कामों से छुट्टी पाकर तिलिस्म की तरफ झुकें। यह खबर चारों तरफ मशहूर हो गई कि चुनारगढ़