कर अपने पिता से मुलाकात की। राजा सुरेन्द्रसिंह के इशारे पर जीतसिंह ने रात को एकान्त में तिलिस्म का हाल कुंवर वीरेन्द्रसिंह से पूछा। उसके जवाब में जो कुछ ठीक-ठीक हाल था, कुमार ने उनसे कहा। जीतसिंह ने उसी जगह तेज़सिंह को बुलवा कर कहा, ‘‘तुम दोनों ऐयार कुमार को साथ लेकर खोह में जाओ और उस छोटे तिलिस्म को कुमार के हाथ से फतह करवाओ जिसका हाल तुम्हारे उस्ताद ने तुमसे कहा था। जो कुछ हुआ है सब इसी बीच में खुल जायेगा। लेकिन तिलिस्म फतह करने के पहले दो काम करो, एक तो थोड़े आदमी ले जाओ और महाराज शिवदत्त को उनकी रानी समेत भेजवा दो, दूसरे जब खोह के अन्दर जाना तो दरवाज़ा भीतर से बन्द कर लेना। अब महाराज से मुलाकात करने और कुछ पूछने की ज़रूरत नहीं, तुम लोग इसी वक़्त यहां से कूच कर जाओ और रानी के वास्ते एक डोली भी साथ लिवाते जाओ।’’ कुंवर वीरेन्द्रसिंह ने तीनों ऐयारों और थोड़े से आदमियों को साथ ले खोह
के इलाके में कोई तिलिस्म है जिसमें कुमारी चंद्रकान्ता और चपला फंस गई हैं। उनको छुड़ाने और तिलिस्म तोड़ने के लिए कुंअर वीरेन्द्रसिंह ने मय फौज के उस जगह डेरा डाला है। तिलिस्म किसको कहते हैं? वह क्या चीज है? उसमें आदमी कैसे फंसता है? कुंअर वीरेन्द्रसिंह उसे क्यों कर तोड़ेंगे? इत्यादि बातो को जानने और देखने के लिए दूर-दूर के बहुत से आदमी उस जगह इकट्ठे हुए जहां कुमार का लश्कर उतरा हुआ था, मगर खौफ के मारे खंडहर के अंदर कोई पैर नहीं रखता था,बाहर से ही देखते थे। कुमार के लश्कर वालों ने घूमते-फिरते कई नकाबपोश सवारों