की तरफ कूच किया। सुबह होते-होते ये लोग वहां पहुंचे। सिपाहियों को कुछ दूर छोड़ चारों आदमी खोह का दरवाज़ा खोल कर अन्दर गये। सवेरा हो गया था, तेज़सिंह ने महाराज शिवदत्त और उनकी रानी को खोह के बाहर लाकर सिपाहियों के सुपुर्द किया और महाराज शिवदत्त को पैदल और उनकी रानी को डोली पर चढ़ाकर जल्दी नौगढ़ पहुंचाने के लिए ताकीद करके फिर खोह के अन्दर पहुंचे। चन्द्रकान्ता ( चौथा भाग : चौथा बयान) राजा सुरेन्द्रसिंह के सिपाहियों ने महाराज शिवदत्त और उनकी रानी को नौगढ़ पहुंचाया। जीतसिंह की राय से उन दोनों के रहने के लिए सुन्दर मकान दिया गया। उनकी हथकड़ी-बेड़ी खोल दी गयी, मगर हिफाज़त के लिए मकान के चारों तरफ सख्त पहरा मुकर्रर कर दिया गया। दूसरे दिन राजा सुरेन्द्रसिंह और जीतसिंह आपस में कुछ राय करके पंडित बद्रीनाथ, पन्नालाल, रामनारायण और चुन्नीलाल इन चारों क़ैदी ऐयारों को साथ ले उस मकान में गये जिसमें महाराज
को भी देखा जिनकी खबर उन लोगों ने कुमार तक पहुंचाई। पंडित बद्रीनाथ, अहमद और नाजिम को साथ लेकर महाराज शिवदत्त को छुड़ाने गये थे, तहखाने में शेर के मुंह से जुबान खींच किवाड़ खोलना चाहा मगर न खुल सका, क्योंकि यहां तेजसिंह ने दोहरा ताला लगा दिया था। जब कोई काम न निकला तब वहां से लौटकर विजयगढ़ गये, ऐयारी की फिक्र में थे कि यह खबर कुंअर वीरेन्द्रसिंह की इन्होंने भी सुनी। लौटकर इसी जगह पहुंचे। पन्नालाल, रामनारायण और चुन्नीलाल भी उसी ठिकाने जमा हुए और इनसबों की यह राय होने लगी कि किसी तरह तिलिस्म तोड़ने में बाधा