शिवदत्त और उनकी महारानी को रक्खा था। राजा सुरेन्द्रसिंह के आने की खबर सुनकर महाराज शिवदत्त अपनी रानी को साथ लेकर दरवाज़े तक इस्तकबाल (आगवानी) के लिए आये और मकान में ले जाकर आदर के साथ बैठाया, इसके बाद खुद दोनों आदमी सामने बैठे। हथकड़ी और बेड़ी पहने ऐयार सभी एक तरफ बैठाये गये। महाराज शिवदत्त ने पूछा, ‘‘इस वक़्त आपने किसलिए तकलीफ की? राजा सुरेन्द्रसिंह ने इसके जवाब में कहा, ‘‘आज तक आपके जी में जो कुछ आया, किया, क्रूरसिंह के बहकाने से हम लोगों को तकलीफ देने के लिए बहुत कुछ उपाय किये, धोखा दिया, लड़ाई ठानी मगर अभी तक परमेश्वर ने हम लोगों की रक्षा की। क्रूरसिंह, नाज़िम और अहमद भी अपनी सजा को पहुंच गये और हम लोगों की बुराई सोचते-सोचते ही मर गये। अब आपका क्या इरादा है? इसी तरह क़ैद में पड़े रहना मंजूर है या और कुछ सोचा है?’’ महाराज शिवदत्त ने कहा, ‘‘आपकी और
डालनी चाहिए। इसी फिक्र में ये लोग भेष बदलकर इधर-उधर तथा लश्कर में घूमने लगे। चन्द्रकान्ता ( दूसरा भाग : पच्चीसवां ब्यान) दूसरे दिन स्नान-पूजा से छुट्टी पाकर कुंअर वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषीजी फिर उस खंडहर में घुसे, सिरका साथ में लेते गये। कल जो पत्थर निकला था उस पर जो कुछ लिखा था फिर पढ़ के याद कर लिया और उसी लिखे के बमूजिब काम करने लगे। बाहर दरवाजे पर बल्कि खंडहर के चारों तरफ पहरा बैठा हुआ था। बगुले के पास गये, उसके सामने की तरफ जो सफेद पत्थर जमीन में गड़ा हुआ था,