कुंवर वीरेन्द्रसिंह की बहादुरी में कोई शक नहीं, जहां तक तारीफ की जाये थोड़ी है। परमेश्वर आपको खुश रखे और पोते का मुख दिखाये। उसे गोद में लेकर आप खिलायें! मैंने कुछ किया उसको आप माफ करें। मुझे राज्य की बिलकुल अभिलाषा नहीं है। चुनार को आपने जिस तरह फतह किया और वहां जो कुछ हुआ मुझे मालूम है। मैं अब सिर्फ एक बात चाहता हूँ, परमेश्वर के लिए तथा अपनी जवांमर्दी और बहादुरी की तरफ खयाल करके मेरी इच्छा पूरी कीजिए। इतना कह हाथ जोड़ कर सामने खड़े हो गये। राजा सुरेन्द्रसिंह : जो कुछ आपके जी में हो कहिये जहां तक हो सकेगा मैं उसको पूरा करूंगा। शिवदत्त : जो कुछ मैं कहता हूं आप सुन लीजिए। मेरे आगे कोई लड़का नहीं है जिसकी मुझे फिक्र हो, हां, चुनार के किले में मेरे रिश्तेदारों की कई बेवाएँ हैं जिनकी परवरिश मेरी ही सबब से होती थी, उनके लिए आप कोई ऐसा बन्दोबस्त कर दें जिससे उन बेचारियों की ज़िन्दगी आराम से गुज़रे। और
जिस पर पैर रखने से बगुला मुंह खोल देता था, उखाड़ लिया। नीचे एक और पत्थर कमानी पर जड़ा हुआ पाया। सफेद पत्थर को सिरके में खूब बारीक पीसकर बगुले के सारे बदन में लगा दिया। देखते-देखते वह पानी होकर बहने लगा, साथ ही इसके एक खूशबू-सी फैलने लगी। दो घंटे में बगुला गल गया। जिस खंभे पर बैठा था वह भी बिल्कुल पिघल गया, नीचे की कोठरी दिखाई देने लगी जिसमें उतरने के लिए सीढ़ियां थीं और इधर-उधर बहुत से तार और कलपुर्जे वगैरह लगे हुए थे। सबों को तोड़ डाला और चारों आदमी नीचे उतरे, भीतर ही भीतर उस कुएं में जा