भी रिश्तें के कई आदमी हैं, लेकिन मैं उनके लिए सिफारिश नहीं करूंगा बल्कि उनका नाम भी न बतलाऊंगा, क्योंकि वे मर्द हैं हर तरह से कमा-खा सकते हैं, और हमको अब आप क़ैद से छुट्टी दीजिए। अपनी स्त्री को साथ ले जंगल में चला जाऊँगा, किसी जगह बैठकर ईश्वर का नाम लूँगा, अब मुँह किसी को दिखाना नहीं चाहता, बस और कोई आरजू नहीं है! सुरेन्द्रसिंह : आपके रिश्ते की जितनी औरतें चुनार में हैं सभी की अच्छी तरह से परवरिश होगी, उनके लिए आपको कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है, मगर आपको छोड़ देने में कई बातों का खयाल है। शिव : कुछ नहीं, (जनेऊ हाथ में लेकर) मैं धर्म की कसम खाता हूं, अब जी में किसी तरह की बुराई नहीं है, कभी आपकी बुराई न सोचूंगा। सुरेन्द्र : अभी आपकी उम्र भी इस लायक नहीं हुई है कि आप तपस्या करें। शिव : जो हो, अगर आप बहादुर हैं, तो मुझे छोड़ दीजिए। सुरेन्द्र : आपकी कसम का तो मुझे
पहुंचे जहां हाथ में किताब लिये बुङ्ढा आदमी बैठा था, सामने एक पत्थर की चौकी पर पत्थर ही के बने रंग-बिरंगे फूल रखे हुए देखे। बाजू पकड़ते ही बुङ्ढे ने मुंह खोल दिया, तेजसिंह से काफूर लेकर कुमार ने उसके मुंह में भर दिया। घंटे भर तक ये लोग उसी जगह बैठे रहे। तेजसिंह ने एक मशाल खूब मोटी पहले ही से बाल ली थी। जब बुङ्ढा गल गया किताब जमीन पर गिर पड़ी, कुमार ने उठा लिया। उसकी जिल्द भी जिस पर कुछ लिखा हुआ था भोजपत्र ही की थी। कुमार ने पढ़ा, उस पर यह लिखा हुआ पाया- “इन फूलों को भी उठा लो, तुम्हारे ऐयारों