कोई भरोसा नहीं, मगर आप जो यह कहते हैं कि अगर बहादुर हैं तो मुझे छोड़ दें तो मैं छोड़ देता हूं, जहां जी चाहे जाइये और जो कुछ आपको खर्च के लिए चाहिए, ले लीजिये। शिव : मुझे खर्च की कोई ज़रूरत नहीं बल्कि रानी के बदन पर जो कुछ ज़ेवर हैं वह भी उतार के दिये जाता हूं। यह कहकर रानी की तरफ देखा, उस बेचारी ने फौरन अपने बदन के सारे गहने उतार दिये। सुरेन्द्र : रानी के बदन से गहने उतरवा दिये यह अच्छा नहीं किया। शिव : जब हम लोग जंगल में ही रहना चाहते हैं तो यह हत्या क्यों लिये जायें? क्या चोरों और डकौतों के हाथों से तकलीफ उठाने के लिए और रात भर सुख की नींद न सोने के लिए? सुरेन्द्र : (उदासी से) देखो शिवदत्तसिंह, तुम हाल ही तक चुनार की गद्दी के मालिक थे, आज तुम्हारा इस तरह से जाना मुझे बुरा मालूम होता है। चाहे तुम हमारे दुश्मन थे, तो भी मुझको इस बेचारी तुम्हारी रानी पर दया आती है।


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के काम आवेंगे। इनके गुण भी इसी किताब में लिखे हुए हैं, इस किताब को डेरे में ले जाकर पढ़ो, आज और कोई काम मत करो।” तेजसिंह ने बड़ी खुशी से उन फूलों को उठा लिया जो गिनती में छ: थे। उस कुएं में से कोठरी में आकर ये लोग ऊपर निकले और धीरे- धीरे खंडहर के बाहर हो गये। थोड़ा दिन बाकी था जब कुंअर वीरेन्द्रसिंह अपने डेरे में पहुंचे। यह राय ठहरी कि रात में इस किताब को पढ़ना चाहिए, मगर तेजसिंह को यह जल्दी थी कि किसी तरह फूलों के गुण मालूम हों। कुमार से कहा, “इस वक्त इन फूलों के गुण पढ़ लीजिए बाकी रात


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