बद्रीनाथ : ईश्वर आपको सुखी रक्खे! आज से हम लोग कुंवर वीरेन्द्रसिंह के हुए, आप अपने हाथों से हमारी हथकड़ी-बेड़ी खोल दीजिए, महाराज शिवदत्त ने अपने हाथों से चारों ऐयारों की हथकड़ी-बेड़ी खोल दी राजा सुरेन्द्रसिंह और तेज़सिंह ने कुछ भी न कहा कि आप इनकी बेड़ी क्यों खोलते हैं। हथकड़ी-बेड़ी खुलने के बाद चारों ऐयार राजा सुरेन्द्रसिंह के पीछे जा कर जा खड़े हुए। जीतसिंह ने कहा, ‘‘अभी एक दफे आप लोग चारों ऐयार मेरे सामने आइये, फिर वहां जाकर खड़े होइये, पहले अपनी मामूली सी रस्म तो अदा कर लीजिए।’’ मुस्कुराते हुए पं. बद्रीनाथ, पन्नालाल, रामनारायण और चुन्नीलाल जीतसिंह के सामने आये और बिना कहे जनेऊ और ऐयारी का बटुआ हाथ में लेकर कसम खाकर बोले, ‘‘आज से मैं राजा सुरेन्द्रसिंह और उनके खानदान का नौकर हुआ। ईमानदारी और मेहनत से अपना काम करूंगा। तेज़सिंह, देवीसिंह और ज्योतिषीजी को अपना भाई समझूंगा। बस, अब तो रस्म पूरी हो
का काम देगा, जो पियेगा बेहोश हो जायगा, इसकी बेहोशी आधा घंटे बाद चढ़ेगी। दो ही फूलों के गुण पढ़े थे कि तीनों ऐयार मारे खुशी के उछल पड़े, कुमार ने किताब बंद कर दी और कहा, “बस अब न पढ़ेंगे।” अब तेजसिंह हाथ जोड़ रहे हैं, कसमें देते जाते हैं कि किसी तरह परमेश्वर के वास्ते पढ़िये, आखिर यह सब आप ही के काम आवेगा, हम लोग आप ही के तो ताबेदार हैं। थोड़ी देर तक दिल्लगी करके कुमार ने फिर पढ़ना शुरू किया- (3) ओरहुर का फूल-पानी में घिसकर पीने से चार रोज तक भूख न लगे। (4) कनेर का फूल-पानी