गई?’’ ‘‘बस, और कुछ बाकी नहीं।’’ इतना कहकर जीतसिंह ने चारों को गले से लगा लिया, फिर से चारों ऐयार सुरेन्द्रसिंह के पीछे जा खड़े हुए। राजा सुरेन्द्रसिंह ने महाराज शिवदत्त से कहा, ‘‘अच्छा अब मैं विदा होता हूं। पहरा अभी उठाता हूं। रात को जब जी चाहे चले जाना मगर आओ गले तो मिल लें।’’ शिव : (हाथ जोड़कर) नहीं, मैं इस लायक नहीं रहा कि आपसे गले मिलूं। ‘‘नहीं, ज़रूर ऐसा करना होगा!’’ कहकर सुरेन्द्रसिंह ने शिवदत्त को जबरदस्ती गले लगा लिया और उदास मुख से विदा हो अपने महल की तरफ रवाना हुए। मकान के चारों तरफ से पहरा उठाते गये। जीतसिंह, बद्रीनाथ, पन्नालाल, रामनारायण और चुन्नीलाल को साथ लिये राजा सुरेन्द्रसिंह अपने दीवान खाने में जाकर बैठे। घण्टों महाराज शिवदत्त के बारे में अफसोस भरी बातचीत होती रही। मौका पाकर जीतसिंह ने अर्ज़ किया, ‘‘अब तो हमारे दरबार में और चार ऐयार हो गये
में घिसकर पैर धो ले तो थकावट या राह चलने की सुस्ती निकल जाय। (5) गुलदावदी का फूल-पानी में घिसकर आंखों में अंजन करे तो अंधेरे में दिखाई दे। (6) केवड़े का फूल-तेल में घिसकर लगावे तो सर्दी असर न करे, कत्थे के पानी में घिसकर किसी को पिलाए तो सात रोज तक किसी किस्म का जोश उसके बदन में बाकी न रहे। इन फूलों को बड़ी खुशी से तेजसिंह ने अपने बटुए में डाल लिया, देवीसिंह और ज्योतिषीजी मांगते ही रहे मगर देखने को भी न दिया। चन्द्रकान्ता ( दूसरा भाग : छब्बीसवाँ ब्यान) इन फूलों को पाकर तेजसिंह जितने