हैं जिसकी बहुत ही खुशी है। अगर ताबेदार को पन्द्रह दिन की छुट्टी मिल जाती तो अच्छी बात थी, यहां से दूर बिरादरी में कुछ काम है, जाना ज़रूरी है।’’ सुरेन्द्र : इधर एक-एक दो-दो रोज़ की कई दफे तुम छुट्टी ले चुके हो। जीतसिंह : जी हां, घर ही में कुछ खास काम था, मगर अबकी तो दूर जाना है इसलिए पन्द्रह दिन की छुट्टी मांगता हूं। मेरी जगह पं. बद्रीनाथ काम करेंगे, किसी बात का हर्ज़ न होगा। सुरेन्द्र : अच्छा जाओ, लेकिन जहां तक हो सके जल्द आना। राजा सुरेन्द्रसिंह से विदा हो जीतसिंह अपने घर गये और बद्रीनाथ वगैरह चारों ऐयारों को भी कुछ समझाने-बुझाने के लिए साथ लेते गये। चन्द्रकान्ता ( चौथा भाग : पांचवाँ बयान) कुंवर वीरेन्द्रसिंह तीनो ऐयारों के साथ खोह के अन्दर घूमने लगे। तेज़सिंह ने इधर-उधर के कई निशानों को देखकर कुमार से कहा, ‘‘बेशक यहां का छोटा तिलिस्म तोड़ कोई खज़ाना ले गया। ज़रूर कुमारी चन्द्रकान्ता


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खुश हुए शायद अपनी उम्र में आज तक कभी ऐसे खुश न हुए होंगे। एक तो पहले ही ऐयारी में बढ़े-चढ़े थे, आज इन फूलों ने इन्हें और बढ़ा दिया। अब कौन है जो इनका मुकाबला करे? हां एक चीज की कसर रह गई, लोपांजन या कोई गुटका इस तिलिस्म में से इनको ऐसा न मिला, जिससे ये लोगों की नजरों से छिप जाते, और अच्छा ही हुआ जो न मिला, नहीं तो इनकी ऐयारी की तारीफ न होती क्योंकि जिस आदमी के पास कोई ऐसी चीज हो जिससे वह गायब हो जाय तो फिर ऐयारी सीखने की जरूरत ही क्या रही। गायब होकर जो चाहा कर डाला। आज की रात इन चारों


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