को भी उसी ने क़ैद किया होगा। मैंने अपने उस्ताद की जुबानी सुना था कि इस खोह में कई इमारतें और बाग देखने, रहने लायक हैं। शायद वह चोर इन्हीं में कहीं मिल जाये, ताज्जुब नहीं।’’ कुमार : तब जहां तक हो सके, काम में जल्दी करनी चाहिए। तेज़सिंह : बस हमारे साथ चलिए, अभी से काम शुरू हो जाये। यह कह तेज़सिंह कुंवर वीरेन्द्रसिंह को उसी पहाड़ी के नीचे ले गये जहां से पानी का चश्मा शुरू होता था। उस चश्में में उतर चालीस हाथ नाप कर कुछ ज़मीन खोदी। कुमार से तेज़सिंह ने कहा था कि , ‘‘इस छोटे तिलिस्म के तोड़ने और खज़ाना पाने की युक्ति किसी धातु के पत्र पर खुदी हुई यहीं ज़मीन में गड़ी है, मगर इस वक़्त यहां खोदने से उसका कुछ पता न लगा, हां एक चिट्ठी उसमें से जरूर मिली जिसको कुमार ने निकालकर पढ़ा यह लिखा था–’’ अब क्या खोदते हो! मतलब की कोई चीज़ नहीं है जो था, सो निकल गया, तिलिस्म टूट गया। अब


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को जागते ही बीती। तिलिस्म की तारीफ, फूलों के गुण, तिलिस्मी किताब के पढ़ने, सबेरे फिर तिलिस्म में जाने आदि की बातचीत में रात बीत गई। सबेरा हुआ, जल्दी-जल्दी स्नान-पूजा से चारों ने छुट्टी पा ली और कुछ भोजन करके तिलिस्म में जाने को तैयार हुए। कुमार ने तेजसिंह से कहा, “हमारे पलंग पर से तिलिस्मी किताब उठा के तुम लेते चलो, वहां फिर एक दफे पढ़ के तब कोई काम करेंगे।” तेजसिंह तिलिस्मी किताब लेने गये, मगर किताब नजर न पड़ी, चारपाई के नीचे हर तरफ देखा, कहीं पता नहीं, आखिर कुमार से पूछा, “किताब कहां है? पलंग पर तो नहीं है?”


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