हाथ मल के पछताओ। तेज़सिंह : (कुमार की तरफ देखकर) देखिए, यह पूरा सबूत तिलिस्म टूटने का मिल गया। कुमार : जब तिलिस्म टूट ही चुका है तो उसके हर एक दरवाज़े भी खुले होंगे। हां ज़रूर खुले होंगे। यह कहकर तेज़सिंह पहाड़ियों पर चढ़ाते-घुमाते-फिराते कुमार को एक गुफा के पास ले गये जिसमें सिर्फ एक आदमी के जाने लायक राह थी। तेज़सिंह के कहने से एक-एक करके चारों आदमी उस गुफा में घूमे। भीतर कुछ दूर जाकर खुलासा जगह मिली, यहां तक कि चारों आदमी खड़े होकर चलने लगे मगर टटोलते हुए, क्योंकि बिलकुल अंधेरा था, हाथ तक नहीं दिखाई देता था। चलते-चलते कुंवर वीरेन्द्रसिंह का हाथ एक बन्द दरवाज़े पर लगा जो धक्का देने से खुल गया और भीतर बाखूबी रोशनी मालूम होने लगी। चारों आदमी अन्दर गये, छोटा-सा बाग देखा जो चारों तरफ से साफ कहीं तिनके तक का नाम-निशान नहीं मालूम होता था, अभी कोई झाड़ू देकर गया
सुनते ही कुमार के होश उड़ गये, जी सन्न हो गया, दौडे हुए पलंग के पास आये। खूब ढूंढा, मगर कहीं किताब हो तब तो मिले। कुमार ‘हाय’ करके पलंग के ऊपर गिर पड़े, बिल्कुल हौसला टूट गया, कुमारी चंद्रकान्ता के मिलने से नाउम्मीद हो गये, अब तिलिस्मी किताब कहां जिसमें तिलिस्म तोड़ने की तरकीब लिखी है। तेजसिंह, देवीसिंह, और जगन्नाथ ज्योतिषी भी घबरा उठे। दो घड़ी तक किसी के मुंह से आवाज तक न निकली, बाद इसके तलाश होने लगी। लश्कर भर में खूब शोर मचा कि कुमार के डेरे से तिलिस्मी किताब गायब हो गई, पहरे वालों पर सख्ती होने लगी,