है। इस बाग में कोई इमारत न थी, सिर्फ एक फौवारा बीच में था, मगर यह नहीं मालूम होता था कि इसका हौज़ कहां है। बाग में घूमने और इधर-उधर देखने से मालूम हुआ कि ये लोग पहाड़ी के ऊपर चले गये हैं। जब फौवारे के पास पहुंचे तो एक बात ताज्जुब की दिखाई पड़ी। उस जगह ज़मीन पर जनाने हाथों का एक जोड़ा कंगन नज़र पड़ा, जिसे देखते ही कुमार ने पहचान लिया कि कुमारी चन्द्रकान्ता के हाथों का यह है। झट उठा लिया, आंखों से आंसू की बूंदें टपकने लगीं, तेज़सिंह से पूछा–‘‘यह कंगन यहां क्योंकर पहुंचा? इसके बारे में क्या खयाल किया जाये?’’ तेज़सिंह कुछ जवाब देना ही चाहते थे कि उनकी निगाह एक काग़ज़ पर जा पड़ी जो उस जगह चिट्ठी की तरह मोड़ा हुआ पड़ा था। जल्दी से उठा लिया और खोलकर पढ़ा यह लिखा था– ‘‘बड़ी होशियारी से जाना, ऐयार लोग पीछा करेंगे, ऐसा न हो कि पता लग जाये नहीं तो तुम्हारा और कुमार दोनों ही का बड़ा भारी नुकसान
चारों तरफ चोर की तलाश में लोग निकले। तेजसिंह ने कुमार से कहा, “आप जी मत छोटा कीजिये, मैं वादा करता हूं कि चोर जरूर पकड़ूंगा, आपके सुस्त हो जाने से सभी का जी टूट जायगा,कोई काम करते न बन पड़ेगा!” बहुत समझाने पर कुमार पलंग से उठे, उसी वक्त एक चोबदार ने आकर अजीब खबर सुनाई। हाथ जोड़कर अर्ज किया कि”तिलिस्म के फाटक पर पहरे के लिए जो लोग मुस्तैद किये गये हैं उनमें से एक पहरे वाला हाजिर हुआ है और कहता है कि तिलिस्म के अंदर कई आदमियों की आहट मिली है, किसी को अंदर जाने का हुक्म तो है नहीं जो ठीक मालूम