होगा। अगर मौका मिला तो कल आऊंगा। वहीं।’’ इस पुर्जे को पढ़कर तेज़सिंह किसी सोच में पड़े गये, देर तक चुपचाप खड़े न जाने क्या-क्या विचार करते रहे। आखिर कुमार से न रहा गया, पूछा, ‘‘क्यों? क्या सोच रहे हो? इस चिट्ठी में क्या लिखा है?’’ तेज़सिंह ने वह चिट्ठी कुमार के हाथों में दे दी, वे भी पढ़कर हैरान हो गये, बोले, ‘‘इसमें जो कुछ लिखा है उस पर गौर करने से तो मालूम होता है कि हमारे वनकन्या के मामले में ही कुछ है मगर किसने लिखा यह पता नहीं लगता।’’ तेज़सिंह : आपका कहना ठीक है, पर मैं एक और बात सोच रहा हूं जो इससे भी ताज्जुब की है। कुमार : वह क्या? तेज़सिंह : इन हरफों को मैं कुछ पहचानता हूं मगर साफ समझ में नहीं आता क्योंकि लिखने वाले ने अपना हर्फ छिपाने के लिए कुछ बिगाड़ कर लिखा है। कुमार : खैर, इस चिट्ठी को रख छोड़ो। कभी-न-कभी कुछ पता लग ही जायेगा अब आगे


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करें, अब जैसा हुक्म हो किया जाय।” इस खबर को सुनते ही तेजसिंह पता लगाने के लिए तिलिस्म में जाने को तैयार हुए। देवीसिंह से कहा, “तुम भी साथ चलो, देख आवें क्या मामला है।”ज्योतिषीजी बोले, “हम भी चलेंगे।” कुमार भी उठ खड़े हुए। आखिर ये चारों तिलिस्म में चले। बाहर फतहसिंह सेनापति मिले, कुमार ने उनको भी साथ ले लिया। दरवाजे के अंदर जाते ही इन लोगों के कान में भी चिल्लाने की आवाज आई, आगे बढ़ने से मालूम हुआ कि इसमें कई आदमी हैं। आवाज की धुन पर ये लोग बराबर बढ़ते चले गये। उस दलान में पहुंचे जिसमें चबूतरे के ऊपर


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