का काम करो। फिर ये लोग घूमने लगे, बाग के कोने में इन लोगों को छोटी-छोटी चार खिड़कियां नज़र आई जो एक के साथ एक बराबर सी बनी हुई थीं, पहले चारों आदमी बाईं तरफ वाली खिड़की में घुसे। थोड़ी दूर जाकर एक दरवाज़ा मिला जिसके आगे जाने की विल्कुल राह न थी क्योंकि नीचे बेढब खतरनाक पहाड़ी दिखाई देती थी। इधर-उधर देखने और खूब गौर करने से मालूम हुआ कि यह वही दरवाज़ा है जिसको इशारे से उस योगी ने तेज़सिंह को दिखाया था। इस जगह से वह दालान बहुत साफ दिखाई देता था जिसमें कुमारी चन्द्रकान्ता और चपला बहुत दिनों तक बेबस पड़ी रही थीं। ये लोग वापस होकर फिर उसी बाग में चले आये और उसके बगल वाली दूसरी खिड़की में घुसे जो बहुत अंधेरी थी। कुछ दूर जाने पर उजाला नज़र पड़ा बल्कि हद तक पहुंचने पर एक बड़ा-सा फाटक मिला। जिससे बाहर होकर ये चारों आदमी खड़े हो चारों ओर निगाह दौड़ाने लगे। लम्बे चौड़े


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हाथ में किताब लिये पत्थर का आदमी सोया था। देखा कि पत्थर वाला आदमी उठ के बैठा हुआ पंडित बद्रीनाथ ऐयार को दोनों हाथों से दबाये है और वह चिल्ला रहे हैं। पन्नालाल, रामनारायण और चुन्नीलाल छुड़ाने की तरकीब कर रहे हैं मगर कोई काम नहीं निकलता। तिलिस्मी किताब के खो जाने का इन लोगों को बड़ा भारी गम था, मगर इस वक्त पंडित बद्रीनाथ ऐयार की यह दशा देख सबों को हंसी आ गई, एकदम खिलखिला के हंस पड़े। उन ऐयारों ने पीछे फिरकर देखा तो कुंअर वीरेन्द्रसिंह मय तीनों ऐयारों के खड़े हैं, साथ में फतहसिंह सेनापति हैं। तेजसिंह ने ललकारकर


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