मैदान के सिवाय और कुछ नज़र न आया। तेज़सिंह ने चाहा कि घूमकर इस मैदान का हाल मालूम करें, मगर कई सबबों से वे ऐसा न कर सके। एक तो धूप कड़ी थी दूसरे कुमार ने घूमने की राय न दी और कहा, ‘‘ फिर जब मौका होगा इसके देख लेंगे। इस वक़्त तीसरी व चौथी खिड़की में चलकर देखने चाहिए क्या है?’’ चारों आदमी लौट आये और तीसरी खिड़की में घुसे। एक बाग में पहुंचते ही देखा कि वनकन्या कई सखियों को लिये घूम रही है लेकिन कुँवर वीरेन्द्रसिंह वगैरह को देखते ही तेज़ी के साथ बाग के एक कोने में जाकर गायब हो गयी। चारों आदमियों ने उसका पीछा किया और घूम-घूमकर तलाश भी किया, मगर कहीं कुछ भी पता न लगा, हां, जिस कोने में वे सब गायब हुई थीं वहां जाने पर एक बंद दरवाज़ा ज़रूर देखा जिसके खोलने की बहुत युक्ति लगायी मगर न खुला। उस बाग के एक तरफ छोटी-सी बारादरी थी। लाचार होकर ऐयारों के साथ कुंवर वीरेन्द्रसिंह
कहा, “वाह खूब, जैसी जिसकी करनी होती है उसको वैसा ही फल मिलता है, इसमें कोई शक नहीं। बेचारे कुंअर वीरेन्द्रसिंह को बेकसूर तुम लोगों ने सताया, इसी की सजा तुम लोगों को मिली! परमेश्वर भी बड़ा इंसाफ करने वाला है। क्यों पन्नालाल तुम लोग जान-बूझकर क्यों फंसते हो? तुम लोगों को तो किसी ने पकड़ा नहीं है, फिर बद्रीनाथ के पीछे क्यों जान देते हो? इनको इसी तरह छोड़ दो, तुम लोग जाओ हवा खाओ!” पन्नालाल ने कहा, “भला इनको ऐसी हालत में छोड़ के हम लोग कहीं जा सकते हैं? अब तो आपके जो जी में आवे सो कीजिये हम लोग हाजिर हैं।”तेजसिंह