उस बारहदरी में एक ओर बैठकर सोचने लगे, ‘‘यह वनकन्या यहां कैसे आयी? क्या उसके रहने का यही ठिकाना है? फिर हम लोगों को देखकर भाग क्यों गई? क्या अभी हमसे मिलना उसे मंजूर नहीं?’’ इन सब बातों को सोचते-सोचते शाम हो गई मगर किसी की अक्ल ने कुछ काम न दिया। इस बाग में मेवों के दरख्त बहुत थे और एक छोटा-सा चश्मा भी था। चारों आदमियों ने मेवों से अपना पेट भरा और चश्में का पानी पीकर उसी बारादरी में ज़मीन पर लेट गये। यह राय ठहरी कि रात को इसी बारहदरी में गुज़ारा करेंगे, सवेरे जो कुछ होगा देखा जायेगा। देवीसिंह ने अपने बटुए में से सामान निकालकर चिराग जलाया, इसके बाद बैठकर आपस में बातें करने लगे। कुमार : चन्द्रकान्ता की मुहब्बत में हमारी दुर्गति हो गई, तिस पर भी अब तक कोई उम्मीद नहीं मालूम पड़ती। तेज़सिंह : कुमारी सही सलामत हैं और आपको मिलेगीं इसमें कोई शक नहीं। जितनी मेहनत से जो चीज़
ने पंडित बद्रीनाथ के पास जाकर कहा, “पंडितजी परनाम! क्यों, मिजाज कैसा है? क्या आप तिलिस्म तोड़ने को आये थे? अपने राजा को तो पहले छुड़ा लिये होते। खैर शायद तुमने यह सोचा कि हम ही तिलिस्म तोड़कर कुल खजाना ले लें और खुद चुनार के राजा बन जायें!” देवीसिंह ने भी आगे बढ़ के कहा, “बद्रीनाथ भाई, तिलिस्म तोड़ना तो उसमें से कुछ मुझे भी देना, अकेले मत उड़ा जाना!” ज्योतिषीजी ने कहा, “बद्रीनाथजी, अब तो तुम्हारे ग्रह बिगड़े हैं! खैरियत तभी है कि वह तिलिस्मी किताब हमारे हवाले करो जिसे आप लोगों ने रात को चुराया है!” बद्रीनाथ सबकी