कुमार : चपला हमारी ही जाति की है, इसका बाप बड़ा भारी जमींदार और पूरा ऐयार था। इसको सात दिन का छोड़कर इसकी मां मर गयी। इसके बाप ने इसे पाला और ऐयारी सिखाई, अभी कुछ वर्ष गुज़रे हैं कि इसका बाप भी मर गया। महाराज जयसिंह उसको बहुत मानते थे, उसने इनके बहुत बड़े-बड़े काम किये थे। मरने के वक़्त अपनी सारी जमा पूँजी और चपला को महाराज के सुपुर्द कर गया। क्योंकि उसका कोई वारिस नहीं था। महाराज जयसिंह इसको लड़की की तरह मानते हैं और महारानी भी इसे बहुत चाहती हैं। कुमारी चन्द्रकान्ता का और उसका लड़कपन ही से साथ होने के सबब से दोनों में मुहब्बत है। तेज़सिंह : आज तो आपने बड़ी खुशी की बात सुनाई बहुत दिनों से इसका खटका लगा था पर कई बातों को सोचकर आपसे नहीं पूछा। भला यह बातें आपको मालूम कैसे हुईं? कुमार : खास चन्द्रकान्ता की जुबानी। तेज़सिंह : तब तो बहुत ठीक है। तमाम
यह सुनकर पन्नालाल ने तिरछी निगाहों से बद्रीनाथ की तरफ देखा, उन्होंने भी कुछ इशारा किया। पन्नालाल ने कुमार से कहा, “हम लोगों ने किताब नहीं चुराई है, नहीं तो ऐसी बेबसी की हालत में जरूर दे देते। या तो किसी तरह से पंडित बद्रीनाथ को छुड़ाइये या हम लोगों के वास्ते यह हुक्म दीजिये कि बाहर जाकर इनके लिए कुछ खाने का सामान लाकर खिलावें, बल्कि जब तक आपकी किताब न मिले आप तिलिस्म न तोड़ लें और बद्रीनाथ उसी तरह बेबस रहें, तब तक हम लोगों में से किसी को खिलाने-पिलाने के लिए यहां आने-जाने का हुक्म हो।” देवीसिंह ने कहा, “पन्नालाल,