रात बातचीत में गुज़र गई, किसी को नींद न आई। सवेरे ही उठ कर ज़रूरी कामों से छुट्टी पा उसी चश्में में नहाकर संध्या-पूजा की और कुछ मेवा खा जिस राह से उस बाग में गये थे उसी राह से लौट आये और चौथी खिड़की के अन्दर क्या है देखने के लिए उसमें घुसे। उसमें भी जाकर हरा-भरा बाग देखा जिसे देखते ही कुमार चौंक पड़े। चन्द्रकान्ता ( चौथा भाग : छठवां बयान) तेजसिंह ने कुँवर वीरेंद्रसिंह से पूछा – ‘आप इस बाग को देख कर चौंके क्यों? इसमें कौन-सी अद्भुत चीज आपको नजर पड़ी?’ कुमार – ‘मैं इस बाग को पहचान गया।’ तेजसिंह – (ताज्जुब से) ‘आपने इसे कब देखा था?’ कुमार – ‘यह वही बाग है जिसमें मैं लश्कर से लाया गया था। इसी में मेरी आँखें खुली थीं, इसी बाग में जब आँखें खुलीं तो कुमारी चंद्रकांता की तस्वीर देखी थी और इसी बाग में खाना भी मिला था, जिसे खाते ही मैं बेहोश हो कर दूसरे बाग में पहुँचाया गया था। वह देखो,


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भला यह तो कहो कि अगर कई रोज तक बद्रीनाथ इसी तरह कैद रह गये तो खाने-पीने का बंदोबस्त तो तुम कर लोगे,जाकर ले आओगे लेकिन अगर इनको दिशा मालूम पड़ेगी तो क्या उपाय करोगे? उसको कहां ले जाकर फेंकोगे? या इसी तरह इनके नीचे ढेर लगा रहेगा?” इसका जवाब पन्नालाल ने कुछ न दिया। तेजसिंह ने कहा, “सुनो जी, ऐयारों को ऐयार लोग खूब पहचानते हैं। अगर तुम्हारे आने-जाने के लिए कुमार हुक्म नहीं देते तो हम हुक्म देते हैं कि आया करो और जिस तरह बने बद्रीनाथ की हिफाजत करो। तुम लोगों ने हमारा बड़ा हर्ज किया, तिलिस्मी किताब चुरा


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