बद्रीनाथ की मदद के लिए कोई और ऐयार आ जाता।’ हरदयालसिंह – ‘नौगढ़ जिस आदमी को भेजेंगे उसी की जान जाएगी, हाँ सौ दो सौ आदमियों के पहरे में कोई खत जाए तो शायद पहुँचे।’ महाराज – (गुस्से में आ कर) ‘नाम को हमारे यहाँ पचासों जासूस हैं, बरसों से हरामखोरों की तरह बैठे खा रहे हैं मगर आज एक काम उनके किए नहीं हो सकता। न कोई जालिम खाँ की खबर लाता है न कोई नौगढ़ खत पहुँचाने लायक है।’ हरदयालसिंह – ‘एक ही जासूस के मरने से सभी के छक्के छूट गए।’ महाराज – ‘खैर, आज शाम को हमारे कुल जासूसों को ले कर बाग में आओ, या तो कुछ काम ही निकालेंगे या सारे जासूस तोप के सामने रख कर उड़ा दिए जाएँगे, फिर जो कुछ होगा देखा जाएगा। मैं खुद उस हरामजादे को पकड़ूँगा।’ हरदयालसिंह – ‘जो हुक्म।’ महाराज – ‘बस अब जाओ, जो हमने कहा है उसकी फिक्र करो।’ दीवान हरदयालसिंह


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चाहते थे कि देवीसिंह और पंडित जगन्नाथ ज्योतिषी भी घूमते हुए आ पहुंचे। ज्योतिषीजी ने पुकारकर कहा, “तेजसिंह, घबराइए मत, अगर आपको किताब न मिली तो उन लोगों के पास भी न रही, जो मैंने पहले कहा था वही हुआ, उस किताब को कोई तीसरा ही ले गया।” अब तेजसिंह का जी कुछ ठिकाने हुआ। कुमार ने कहा, “वाह खूब, आप भी रोये और मुझको भी रुलाया। जिसके हाथ में किताब पहुंची उसे मैंने देखा मगर उसका हाल कहने का कुछ मौका तो मिला नहीं तुम पहले से ही रोने लगे!!” इतना कह के कुमार ने उस तरफ देखा जिधर वे औरतें गई थीं मगर


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