आ कर खड़ी हो गई, खत कुमार के हाथ में दे दिया। उन्होंने ताज्जुब में आ कर खुद उसे पढ़ा, लिखा हुआ था – ‘कई दिनों से आप हमारे इलाके में आए हुए हैं, इसलिए आपकी मेहमानदारी हमको लाजिम है। आज सब सामान दुरुस्त किया है। इसी लौंडी के साथ आइए और झोंपड़ी को पवित्र कीजिए। इसका अहसान जन्म भर न भूलूँगा। – सिद्धनाथ योगी।’ कुमार ने खत तेजसिंह के हाथ में दे दिया, उन्होंने पढ़ कर कहा – ‘साधु हैं, योगी हैं, इसी से इस खत में कुछ हुकूमत भी झलकती है।’ देवीसिंह और ज्योतिषी जी ने भी खत को पढ़ा। शाम हो चुकी थी, कुमार ने अभी उस खत का कुछ जवाब नहीं दिया था कि तेजसिंह ने उस औरत से कहा – ‘हम लोगों को महात्मा जी की खातिर मंजूर है, मगर अभी तुम्हारे साथ नहीं जा सकते, घड़ी भर के बाद चलेंगे, क्योंकि संध्या करने का समय हो चुका है।’ औरत – ‘तब तक मैं ठहरती हूँ, आप लोग संध्या कर लीजिए,


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देखते और लंबी-लंबी सांसें लेते देख तेजसिंह ने कुछ न पूछा। पहर भर तक कुमार ने चारों तरफ खोजा मगर फिर उन औरतों पर निगाह न पड़ी। आखिर आंखें डबडबा आईं और एक पेड़ के नीचे खड़े हो गए। तेजसिंह ने पूछा, “आप कुछ खुलासा कहिए भी तो कि क्या मामला है?” कुमार ने कहा, “अब इस जगह कुछ न कहेंगे। लश्कर में चलो, फिर जो कुछ है सुन लेना।” सब कोई लश्कर में पहुंचे। कुमार ने कहा, “पहले तिलिस्मी खंडहर में चलो। देखें बद्रीनाथ की क्या कैफियत है!” यह कहकर खंडहर की तरफ चले, ऐयार सब पीछे-पीछे रवाना हुए।


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