अगर हुक्म हो तो संध्या के समय के लिए जल और आसन ले आऊँ?’ देवीसिंह – ‘नहीं कोई जरूरत नहीं।’ औरत – ‘तो फिर यहाँ संध्या कैसे कीजिएगा? इस बाग में कोई नहर नहीं, बावड़ी नहीं।’ तेजसिंह – ‘उस दूसरे बाग में बावड़ी है।’ औरत – ‘इतनी तकलीफ करने की क्या जरूरत है, मैं अभी सब सामान लिए आती हूँ, या फिर मेरे साथ चलिए, उस बाग में संध्या कर लीजिएगा, अभी तो उसका समय भी नहीं बीत चला है।’ तेजसिंह – ‘नहीं, हम लोग इसी बाग में संध्या करेंगे, अच्छा जल ले आओ।’ इतना सुनते ही वह औरत लपकती हुई तीसरे बाग में चली गई। कुमार – ‘इस खत को भेजने वाले अगर वे ही योगी हैं, जिन्होंने मुझे कूदने से बचाया था तो बड़ी खुशी की बात है, जरूर वहाँ वनकन्या से भी मुलाकात होगी। मगर तुम रुक क्यों गए, उसी बाग में चल कर संध्या कर लेते। मैं तो उसी वक्त कहने को था मगर यह


579 of 692

खंडहर के दरवाजे के अंदर पैर रखा ही था कि सामने से पंडित बद्रीनाथ, पन्नालाल वगैरह आते दिखाई पड़े। कुमार-यह देखो वह लोग इधर ही चले आ रहे हैं! मगर हैं, यह बद्रीनाथ छूट कैसे गये? तेजसिंह-बड़े ताज्जुब की बात है! देवीसिंह-कहीं किताब उन लोगों के हाथ तो नहीं लग गई। अगर ऐसा हुआ तो बड़ी मुश्किल होगी। फतह-इससे निश्चिंत रहो, वह किताब इनके हाथ अब तक नहीं लगी, हां आगे मिल जाय तो मैं नहीं कह सकता, क्योंकि अभी थोड़ी ही देर हुई है वह दूसरे के हाथ में देखी जा चुकी है। इतने में बद्रीनाथ


579 of 1085