समझ कर चुप हो रहा कि शायद इसमें भी तुम्हारा कोई मतलब हो।’ तेजसिंह – ‘जरूर ऐसा ही है।’ देवीसिंह – ‘क्यों उस्ताद, इसमें क्या मतलब है?’ तेजसिंह – ‘देखो मालूम ही हुआ जाता है।’ कुमार – ‘तो कहते क्यों नहीं, आखिर कब बतलाओगे?’ तेजसिंह – ‘हमने यह सोचा कि कहीं योगी जी हम लोगों से धोखा न करें कि खाने-पीने में बेहोशी की दवा मिला कर खिला दें, जब हम लोग बेहोश हो जाएँ तो उठवा कर खोह के बाहर रखवा दें और यहाँ आने का रास्ता बंद करवा दें, ऐसा होगा तो कुल मेहनत ही बरबाद हो जाएगी। देखिए आप भी इसी बाग में बेहोश किए गए थे, जब कैदी बना कर लाए थे और प्यास लगने पर एक कटोरा पानी पीया था, उसी वक्त बेहोश हो गए और खोह में ले जा कर रख दिए गए थे। अगर ऐसा न हुआ होता तो उसी समय कुछ-न-कुछ हाल यहाँ का मिल गया होता। फिर मैं यह भी सोचता हूँ कि अगर हम लोग वहाँ
वगैरह पास आ गये। पन्नालाल ने पुकार के कहा, “क्यों तेजसिंह, अब तो हार गये न!” तेज-हम क्यों हारे! बद्री-क्यों नहीं हारे, हम छूट भी गये और किताब भी न दी। तेज-किताब तो हम पा गये, तुम चाहे आपसे आप छूटो या मेरे छुड़ाने से छूटो! किताब पाना ही हमारा जीतना हो गया, अब तुमको चाहिए कि महाराज शिवदत्त को छोड़कर कुमार के साथ रहो। बद्री-हमको वह किताब दिखा दो, हम अभी ताबेदारी कबूल करते हैं। तेज-तो तुम ही क्यों नहीं दिखा देते, जब तुम्हारे पास नहीं तो साबित हो गया कि हम पा गये। बद्री-बस-बस,