जा कर भोजन से इनकार करेंगे तो ठीक न होगा क्योंकि दावत कबूल करके मौके पर खाने से इनकार कर जाना उचित नहीं है।’ देवीसिंह – ‘तो फिर इसकी तरकीब क्या सोची है?’ तेजसिंह – (हँस कर) ‘तरकीब क्या, बस वही तिलिस्मी गुलाब का फूल घिस कर सभी को पिलाऊँगा और आप भी पीऊँगा, फिर सात दिन तक बेहोश करने वाला कौन है?’ कुमार – ‘हाँ ठीक है, पर वह वैद्य भी कैसा चतुर होगा जिसने दवाइयों से ऐसे काम के नायाब फूल बनाए।’ तेजसिंह – ‘ठीक ही है।’ इतने में वही औरत सामने से आती दिखाई पड़ी, उसके पीछे तीन लौंडियाँ आसन, पँचपात्र, जल इत्यादि हाथों में लिए आ रही थीं। उस बाग में एक पेड़ के नीचे कई पत्थर बैठने लायक रखे हुए थे, औरतों ने उन पत्थरो पर सामान दुरुस्त कर दिया, इसके बाद तेजसिंह ने उन लोगों से कहा – ‘अब थोड़ी देर के वास्ते तुम लोग अपने बाग में चली जाओ क्योंकि औरतों के


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हम बेफिक्र हो गये, तुम्हारी बातचीत से मालूम हो गया कि तुमने किताब नहीं पाई और उसे कोई तीसरा ही उड़ा ले गया, अभी तक हम डरे हुए थे। देवी-फिर आखिर हारा कौन यह भी तो कहो? बद्री-कोई भी नहीं हारा। कुमार-अच्छा यह तो कहो तुम छूटे कैसे! बद्री-बस ईश्वर ने छुड़ा दिया, जानबूझ के कोई तरकीब नहीं की गई। पन्नालाल ने उसके सिर पर एक लकड़ी रखी, उस पत्थर के आदमी ने मुझको छोड़ लकड़ी पकड़ी बस मैं छूट गया। उसके हाथ में वह लकड़ी अभी तक मौजूद है। कुमार-अच्छा हुआ, दोनों की ही बात रह गई।


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