सामने हम लोग संध्या नहीं करते।’ ‘आप ही लोगों की खिदमत करते जनम बीत गया, ऐसी बातें क्यों करते हैं। सीधी तरह से क्यों नहीं कहते कि हट जाओ। लो मैं जाती हूँ।’ कहती हुई वह औरत लौंडियों को साथ ले चली गई। उसकी बात पर ये लोग हँस पड़े और बोले – ‘जरूर ऐयारों के संग रहने वाली है।’ संध्या करने के बाद तेजसिंह ने तिलिस्मी गुलाब का फूल पानी में घिस कर सभी को पिलाया तथा आप भी पीया और तब राह देखने लगे कि फिर वह औरत आए तो उसके साथ हम लोग चलें। थोड़ी देर के बाद वही औरत फिर आई, उसने इन लोगों को चलने के लिए कहा। ये लोग भी तैयार थे, उठ खड़े हुए और उसके पीछे रवाना हो कर तीसरे बाग में पहुँचे। ऐयारों ने अभी तक इस बाग को नहीं देखा था मगर कुँवर वीरेंद्रसिंह इसे खूब पहचानते थे। इसी बाग में कैदियों की तरह लाए गए थे और यहीं पर कुमारी चंद्रकांता की तस्वीर का दरबार देखा था मगर आज


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बद्री-कुमार, मेरा जी तो चाहता है कि आपके साथ रहूं मगर क्या करूं, नमकहरामी नहीं कर सकता, कोई तो सबब होना चाहिए! अब मुझे आज्ञा हो तो बिदा होऊं। कुमार-अच्छा जाओ। ज्यो-अच्छा हमारी तरफ नहीं होते तो न सही मगर ऐयारी तो बंद करो। तेज-वाह ज्योतिषीजी, आखिर वेदपाठी ही रहे। ऐयारी से क्या डरना? ये लोग जितना जी चाहें जोर लगा लें! पन्ना-खैर देखा जायगा, अभी तो जाते है, जय माया की! तेज-जय माया की! बद्रीनाथ वगैरह वहां से चले गए। फिर कुमार भी तिलिस्म में न गये और अपने डेरे में


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