सामने की तरफ चार-पाँच लौंडियाँ हाथ जोड़े खड़ी थीं। कुमार को आते देख योगी जी उठ खड़े हुए, दरवाजे तक आ कर उनका हाथ पकड़ अपनी गद्दी के पास ले गए और अपने बगल में दाहिने ओर मृगछाला पर बैठाया। वनकन्या उठ कर कुछ दूर जा खड़ी हुई और प्रेम-भरी निगाहों से कुमार को देखने लगी। सब तरफ से हट कर कुमार की निगाह भी वनकन्या की तरफ जा डटी। इस वक्त इन दोनों की निगाहों से मुहब्बत, हमदर्दी और शर्म टपक रही थी। चारों आँखें आपस में घुल रही थीं। अगर योगी जी का ख्याल न होता तो दोनों दिल खोल कर मिल लेते, मगर नहीं, दोनों ही को इस बात का ख्याल था कि इन प्रेम की निगाहों को योगी जी न जानने पाएँ। कुछ ठहर कर योगी और कुमार में बातचीत होने लगी। योगी – ‘आप और आपकी मंडली के लोग कुशल-मंगल से तो हैं?’ कुमार – ‘आपकी दया से हर तरह से प्रसन्न हैं, परंतु…। योगी – ‘परंतु क्या?’
हो। कुमार-क्या कहें हमारी तो अजब हालत है! (ऊंची सांस लेकर चुप हो रहे) तेज-आपकी विचित्र ही दशा हो रही है, कुछ समझ में नहीं आता। (फतहसिंह की तरफ देख के) आप तो इनके साथ थे, आप ही खुलासा हाल कहिए, यह तो बारह दफे लंबी सांस लेगे तो डेढ़ बात कहेंगे! जगह-जगह तो इनको इश्क पैदा होता है, एक बला से छूटे नहीं दूसरी खरीदने को तैयार हो गए।” फतहसिंह ने सब हाल खुलासा कह सुनाया। तेजसिंह बहुत हैरान हुए कि वह कौन थी और उसने कुमार को पहले कब देखा, कब आशिक हुई और तस्वीर कैसे उतरवा