उस्ताद, यह तो तुमने बहुत ही बढ़िया चीज बनाई है।’ आफत – ‘क्यों, अब तो महल में चलने का हौसला हुआ?’ जालिम – ‘शुक्र है उस पाक परवरदिगार का जिसने तुम्हें मिला दिया। जो काम हम साल भर में करते सो तुम एक रोज में कर सकते हो। वाह उस्ताद वाह। अब तो हम लोग उछलते-कूदते महल में चलेंगे और सभी को दोजख में पहुँचाएँगे, लाओ एक-एक गोला सभी को दे दो।’ आफत – ‘अभी क्यों, जब चलने लगेगे दे देंगे, कल का दिन जो काटना है।’ जालिम – ‘अच्छा, लेकिन उस्ताद, तुमने इतने दिन पीछे का इश्तिहार क्यों दिया? आज का ही दिन अगर मुकर्रर किया होता तो मजा हो जाता।’ आफत – ‘हमने समझा कि बद्रीनाथ जरा चालाक है, शायद जल्दी हाथ न लगे इसलिए ऐसा किया, मगर यह तो निरा बोदा निकला।’ जालिम – ‘अब क्या करना चाहिए?’ आफत – ‘इस वक्त तो कुछ नहीं, मगर कल बारह बजे रात को
उसको बुला के देखो कौन है! देवीसिंह को भेजकर फतहसिंह को मय ऐयार के बुलवाया। जब बद्रीनाथ की सूरत देखी तो खुश हो गये और बोले, “क्यों, अब क्या इरादा है?” बद्री-इरादा जो पहले था वही अब भी है? तेज-अब भी शिवदत्त का साथ छोड़ोगे या नहीं? बद्री-महाराज शिवदत्त का साथ क्यों छोड़ने लगे? तेज-तो फिर कैद हो जाओगे। बद्री-चाहे जो हो। तेज-यह न समझना कि तुम्हारे साथी लोग छुड़ा ले जायेंगे, हमारा कैदखाना ऐसा नहीं है। बद्री-उस कैदखाने का हाल भी मालूम है, वहां भेजो भी तो सही।