महल में चलने के लिए तैयार रहना चाहिए।’ जालिम – ‘इसके कहने की कोई जरूरत नहीं, अब तो हम और तुम साथ ही हैं, जब जो कहोगे, करेंगे।’ आफत – ‘अच्छा तो आज यहाँ से टल कर किसी दूसरी जगह आराम करना मुनासिब है। कल देखो खुदा क्या करता है। मैं तो कसम खा चुका हूँ कि महल में जा कर बिना सभी का काम तमाम किए एक दाना मुँह में नहीं डालूँगा।’ जालिम – ‘उस्ताद, ऐसा नहीं करना चाहिए, तुम कमजोर हो जाओगे।’ आफत – ‘बस चुप रहो, बिना खाए हमारा कुछ नहीं बिगड़ सकता।’ इसके बाद वे सब वहाँ से उठ कर एक तरफ को रवाना हो गए। चन्द्रकान्ता ( चौथा भाग : बारहवां बयान) वह दिन आ गया कि जब बारह बजे रात को बद्रीनाथ का सिर ले कर आफत खाँ महल में पहुँचे। आज शहर भर में खलबली मची हुई थी। शाम ही से महाराज जयसिंह खुद सब तरह का इंतजाम कर रहे थे।
देवी-वाह रे निडर। तेजसिंह ने फतहसिंह से कहा, “इनके ऊपर सख्त पहरा मुकर्रर कीजिए। अब रात हो गई है, कल इनको बड़े घर पहुंचाया जायगा।” फतहसिंह ने अपने मातहत सिपाहियों को बुलाकर बद्रीनाथ को उनके सुपुर्द किया, इतने ही में चोबदार ने आकर एक खत उनके हाथ में दी और कहा कि एक नकाबपोश सवार बाहर हाजिर है जिसने यह खत राजकुमार को देने के लिए दी है!” तेजसिंह ने लिफाफे को देखा, यह लिखा हुआ था- “कुंअर वीरेन्द्रसिंहजी के चरण कमलों में-” तेजसिंह ने कुमार के हाथ में दिया, उन्होंने खोलकर