तेजसिंह और बद्रीनाथ महाराज से विदा हो दीवान हरदयालसिंह के घर आए। चन्द्रकान्ता ( चौथा भाग : चौदहवां बयान) सुबह को खुशी-खुशी महाराज ने दरबार किया। तेजसिंह और बद्रीनाथ भी बड़ी इज्जत से बैठाए गए। महाराज के हुक्म से जालिम खाँ और उसके चारों साथी दरबार में लाए गए जो हथकड़ी-बेड़ी से जकड़े हुए थे। हुक्म पा तेजसिंह, जालिम खाँ से पूछने लगे – तेजसिंह – ‘क्यों जी, तुम्हारा नाम ठीक-ठीक जालिम खाँ है या और कुछ?’ जालिम – ‘इसका जवाब मैं पीछे दूँगा, पहले यह बताइए कि आप लोगों के यहाँ ऐयारों को मार डालने का कायदा है या नहीं?’ तेजसिंह – ‘हमारे यहाँ क्या हिंदुस्तान भर में कोई धार्मिष्ठ हिंदू राजा ऐयार को कभी जान से न मारेगा। हाँ, वह ऐयार जो अपने कायदे के बाहर काम करेगा जरूर मारा जाएगा।’ जालिम – ‘तो क्या हम लोग मारे जाएँगे?’ तेजसिंह – ‘यह खुशी महाराज की, मगर क्या तुम लोग ऐयार
बजाई, साथ ही उस नाव में से इस तरह सीटी की आवाज आई जैसे किसी ने जवाब दिया हो। उन औरतों में से जो उस नाव पर बैठी थीं दो औरतें उठ खड़ी हुईं तथा नीचे उतर एक डोंगी जो उस नाव के साथ बंधी थी, खोलकर किनारे ला नकाबपोश को उस पर चढ़ा ले गयीं। अब ये तीनों ऐयार आपस में बातें करने लगे- तेज-वाह, इस नाव पर छूटते हुए दो माहताबों के बीच ये औरतें कैसी भली मालूम होती हैं। ज्योतिषी-परियों का अखाड़ा मालूम होता है, चलो तैर के उनके पास चलें। देवी-ज्योतिषीजी, कहीं ऐसा न हो कि परियां आपको उड़ा ले