हो जो ऐसी बातें पूछते हो?’ जालिम – ‘हाँ, हम लोग ऐयार हैं।’ तेजसिंह – ‘राम-राम, क्यों ऐयारी का नाम बदनाम करते हो। तुम तो पूरे डाकू हो, ऐयारी से तुम लोगों का क्या वास्ता?’ जालिम – ‘हम लोग कई पुश्त से ऐयार होते आ रहे हैं कुछ आज नए ऐयार नहीं बने।’ तेजसिंह – ‘तुम्हारे बाप-दादा शायद ऐयार हुए हों, मगर तुम लोग तो खासे दुष्ट डाकुओं में से हो।’ जालिम – ‘जब आपने हमारा नाम डाकू ही रखा है, तो बचने की क्या उम्मीद हो सकती है।’ तेजसिंह – ‘जो हो, खैर यह बताओ कि तुम हो कौन?’ जालिम – ‘जब मारे ही जाना है तो नाम बता कर बदनामी क्यों लें और अपना पूरा हाल भी किसलिए कहें। हाँ इसका वादा करो कि जान से न मारोगे तो कहें।’ तेजसिंह – ‘यह वादा कभी नहीं हो सकता और अपना ठीक-ठीक हाल भी तुमको झख मार कर कहना होगा।’ जालिम – ‘कभी नहीं कहेंगे।’
जायं, फिर हमारी मंडली में एक दोस्त कम हो जायगा। तेज-मैं जहां तक ख्याल करता हूं यह उन्हीं लोगों की मंडली है जिन्हें कुमार ने देखा था। देवी-इसमें तो कोई शक नहीं। ज्यो-तो तैर के चलते क्यों नहीं? तुम तो जल से ऐसा डरते हो जैसे कोई बुङ्ढा आफियूनी डरता हो। देवी-फिर तुम्हारे साथ आने से क्या फायदा हुआ? तुम्हारी तो बड़ी तारीफ सुनते थे कि ज्योतिषीजी ऐसे हैं, वैसे हैं, पहिया हैं, चर्खे हैं मगर कुछ नहीं,एक अदनी-सी मंडली का पता नहीं लगा सकते। ज्यो-मैं क्या खाक बताऊं? वे लोग तो मुझसे भी ज्यादे ओस्ताद मालूम होती हैं! सबों