तेजसिंह – ‘फिर जूतों से तुम्हारे सिर की खबर खूब ली जाएगी।’ जालिम – ‘चाहे जो हो।’ बद्रीनाथ – ‘वाह रे जूतीखोर।’ जालिम – (बद्रीनाथ से) ‘उस्ताद, तुमने बड़ा धोखा दिया, मानता हूँ तुमको।’ बद्रीनाथ – ‘तुम्हारे मानने से होता ही क्या है, आज नहीं तो कल तुम लोगों के सिर धड़ से अलग दिखाई देंगे।’ जालिम – ‘अफसोस कुछ करने न पाए।’ तेजसिंह ने सोचा कि इस बकवास से कोई मतलब न निकलेगा, हजार सिर पटकेंगे पर जालिम खाँ अपना ठीक-ठीक हाल कभी न कहेगा, इससे बेहतर है कि कोई तरकीब की जाए, अस्तु कुछ सोच कर महाराज से अर्ज किया – ‘इन लोगों को कैदखाने में भेजा जाए फिर जैसा होगा देखा जाएगा, और इनमें से वह एक आदमी (हाथ से इशारा करके) इसी जगह रखा जाए।’ महाराज के हुक्म से ऐसा ही किया गया। तेजसिंह के कहे मुताबिक उन डाकुओं में से एक को उसी जगह छोड़ बाकी सभी
ने अपने-अपने नाम ही बदल दिये हैं, असल नाम का पता लगाना चाहते हैं तो अजीब-गरीब नामों का पता लगता है। किसी का नाम वियोगिनी, किसी का नाम योगिनी, किसी का भूतनी किसी का डाकिनी, भला भताइये क्या मैं मान लूं कि इन लोगों के यही नाम हैं? तेज-तो इन लोगों ने अपना नाम क्यों बदल लिया? ज्यो-हम लोगों को उल्लू बनाने के लिए। देवी-अच्छा नाम जाने दीजिये इनके मकाम का पता लगाइये। ज्यो-मकाम के बारे में जब रमल से दरियाफ्त करते हैं तो मालूम होता है कि इन लोगों का मकाम जल में है, तो क्या हम समझ लें कि ये लोग जलवासी