जाएगी, उतना ही डर तुम्हारे शैतान भाइयों को होगा।’ डाकू – ‘तो क्या अब किसी तरह हमारी जान नहीं बच सकती?’ तेजसिंह – ‘सिर्फ एक तरह से बच सकती है।’ डाकू – ‘कैसे?’ तेजसिंह – ‘अगर अपने साथियों का हाल ठीक-ठीक कह दो तो अभी छोड़ दिए जाओगे।’ डाकू – ‘मैं ठीक-ठीक हाल कह दूँगा।’ तेजसिंह – ‘हम लोग कैसे जानेंगे कि तुम सच्चे हो?’ डाकू – ‘साबित कर दूँगा कि मैं सच्चा हूँ।’ तेजसिंह – ‘अच्छा कहो।’ डाकू – ‘सुनो कहता हूँ।’ इस वक्त दरबार में भीड़ लगी हुई थी। तेजसिंह ने आग की अंगीठी क्यों मँगाई? ये लोहे की सलाइएँ किस काम आएँगी? यह डाकू अपना ठीक-ठीक हाल कहेगा या नहीं? यह कौन है? इत्यादि बातों को जानने के लिए सभी की तबीयत घबरा रही थी। सभी की निगाहें उस डाकू के ऊपर थीं। जब उसने कहा कि मैं ठीक-ठीक हाल कह दूँगा। तब और भी लोगों का ख्याल


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कर दिया है। देवी-चलिये किनारे, इन्होंने तो बेढब छकाया, मालूम होता है कि किनारे पर कोई पहरे वाला खड़ा देखता था। जब हम लोग तैर के जाने लगे उसने सीटी बजाई, बस अधेरा हो गया, पहले ही से इशारा बंधा हुआ था। ज्यो-इस नालायक को यह क्या सूझी कि जब हम लोग पानी में उतर चुके तब सीटी बजाई, पहले ही बजाता तो हम लोग क्यों भीगते? ये तीनो ऐयार लौटकर किनारे आये, पहिरने के वास्ते अपना कपड़ा खोजते हैं तो मिलता ही नहीं। देवी-ज्योतिषीजी पालागी, लीजिए कपड़े भी गायब हो गये! हाय इस वक्त अगर इन लोगों में


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