जिसका जवाब महाराज ने यह दिया कि जब तक बद्रीनाथ लौट कर नहीं आते या उनका कुछ हाल मालूम न हो ले, हम इसी तरह बैठे रहेंगे।’ चन्द्रकान्ता ( चौथा भाग : पन्द्रहवां बयान) दो घंटे बाद दरबार के बाहर से शोरगुल की आवाज आने लगी। सभी का ख्याल उसी तरफ गया। एक चोबदार ने आ कर अर्ज किया कि पंडित बद्रीनाथ उस खूनी को पकड़े लिए आ रहे हैं। उस खूनी को कमंद से बाँधे साथ लिए हुए पंडित बद्रीनाथ आ पहुँचे। महाराज – ‘बद्रीनाथ, कुछ यह भी मालूम हुआ कि यह कौन है?’ बद्रीनाथ – ‘कुछ नहीं बताता कि कौन है और न बताएगा।’ महाराज – ‘फिर?’ बद्रीनाथ – ‘फिर क्या? मुझे तो मालूम होता है कि इसने अपनी सूरत बदल रखी है।’ पानी मँगवा कर उसका चेहरा धुलवाया गया, अब तो उसकी दूसरी ही सूरत निकल आई। भीड़ लगी थी, सभी में खलबली पड़ गई, मालूम होता था कि इसे
हाल जरा दम ले के कहेंगे।” तीनों ऐयारों ने अपने-अपने कपड़े मंगवाकर पहरे, इतने में साफ सबेरा हो गया। कुमार ने तेजसिंह से पूछा, “अब बताओ तुम लोग किस बला में फंस गए?” तेज-ऐसा धोखा खाया कि जन्म भर याद करेंगे। कुमार-वह क्या? तेज-जिनके ऊपर आप जान दिये बैठे हैं, जिनकी खोज में हम लोग मारे-मारे फिरते हैं, इसमें तो कोई शक नहीं कि उनका भी प्रेम आपके ऊपर बहुत है,मगर न मालूम इतनी छिपी क्यों फिरती हैं और इसमें उन्होंने क्या फायदा सोचा है? कुमार-क्या कुछ पता लगा? तेज-पता क्या