जालिम – (जोर से) ‘ऐसा ही होगा।’ इन दोनों की बातचीत से महाराज को बड़ा क्रोध आया। आँखें लाल हो गईं, बदन काँपने लगा। तेजसिंह और बद्रीनाथ की तरफ देख कर बोले – ‘बस हमको इन लोगों का हाल मालूम करने की कोई जरूरत नहीं, चाहे जो हो, अभी, इसी वक्त, इसी जगह, मेरे सामने इन लोगों का सिर धाड़ से अलग कर दिया जाए।’ हुक्म की देर थी, तमाम शहर इन डाकुओं के खून का प्यासा हो रहा था, उछल-उछल कर लोगों ने अपने-अपने हाथों की सफाई दिखाई। सभी की लाशें उठा कर फेंक दी गईं। महाराज उठ खड़े हुए। तेजसिंह ने हाथ जोड़ कर अर्ज किया – ‘महाराज, मुझे अभी तक कहने का मौका नहीं मिला कि यहाँ किस काम के लिए आया था और न अभी बात कहने का वक्त है।’ महाराज – ‘अगर कोई जरूरी बात हो तो मेरे साथ महल में चलो।’ तेजसिंह – ‘बात तो बहुत जरूरी है मगर इस समय कहने को जी
उन लोगों को इनकी खबर भी न होगी, इस बात को मैं खूब विचार चुका हूं। तेज-इतनी ही खैरियत है। देवी-आज दिन ही को चलकर पता लगायेंगे। तेज-तिलिस्म तोड़ने का काम कैसे चलेगा? कुमार-एक रोज काम बंद रहेगा तो क्या होगा? तेज-इसी से तो मैं कहता हूं कि चंद्रकान्ता की मुहब्बत आपके दिल से कम हो गई है। कुमार-कभी नहीं, चंद्रकान्ता से बढ़कर मैं दुनिया में किसी को नहीं चाहता मगर न मालूम क्या सबब है कि वनकन्या का हाल मालूम करने के लिए भी जी बेचैन रहता है। तेज-(हंसकर) खैर पहले तो