की तरह ऐंठे हुए पत्तो क्या कैफियत दिखा रहे हैं और इधर-उधर हट के दोनों तरफ तिरकोनिया तख्तों की भी रंगत देखिए जो सिर्फ हाथ-भर ऊँचे रंगीन छिटकती हुई धारियों वाले पत्तो के जंगली पेड़ों (कौलियस) के गमलों से पहाड़ीनुमा सजाए हुए हैं और जिनके चारों तरफ रंग-बिरंगे देशी फूल खिले हुए हैं। अब तो हमारी निगाह इधर-उधर और खूबसूरत क्यारियों, फूलों और छूटते हुए फव्वारों का मजा नहीं लेती, क्योंकि उन तीन औरतों के पास जा कर अटक गई है, जो मेंहदी के पत्ते तोड़ कर अपनी झोलियों में बटोर रही हैं। यहाँ निगाह भी अदब करती है, क्योंकि उन तीनों औरतों में से एक तो हमारी उपन्यास की ताज वनकन्या है और बाकी दोनों उसकी प्यारी सखियाँ हैं। वनकन्या की पोशाक तो सफेद है, मगर उसकी दोनों सखियों की सब्ज और सुर्ख। वे तीनों मेंहदी की पत्तियाँ तोड़ चुकी, अब इस संगमरमर के चबूतरे की तरफ चली आ रही हैं। शायद इन्हीं तीनों पलंगों पर बैठने का इरादा हो।
होता है? अगर इस पर कुमार का नाम न लिखा होता तो पढ़ लेते। देवी-हां चलो, पहले खत का हाल सुन लें तब कोई कार्रवाई सोचें। दोनों आदमी लौटकर लश्कर में आये और कुंअर वीरेन्द्रसिंह के डेरे में पहुंचकर सब हाल कह खत हाथ में दे दी। कुमार ने पढ़ा, यह लिखा हुआ था- “चाहे जो हो, पर मैं आपके सामने तब तक नहीं हो सकती जब तक आप नीचे लिखी बातों का लिखकर इकरार न कर लें। (1) चंद्रकान्ता से और मुझसे एक ही दिन एक ही सायत में शादी हो। (2) चंद्रकान्ता से रुतबे में मैं किसी तरह कम न समझी