हमारा सोचना ठीक हुआ। वनकन्या मेंहदी की पत्तियाँ जमीन पर उझल कर थकावट की मुद्रा में बिचले जड़ाऊ पलँग पर लेट गई और दोनों सखियाँ अगल-बगल वाले दोनों पलँगों पर बैठ गई। पाठक, हम और आप भी एक तरफ चुपचाप खड़े हो कर इन तीनों की बातचीत सुनें। वनकन्या – ‘ओफ, थकावट मालूम होती है।’ सब्ज कपड़े वाली सखी – ‘घूम कर क्या कम आए है?’ सुर्ख कपड़े वाली सखी – (दूसरी सखी से) ‘क्या तू भी थक गई है?’ सब्ज सखी – ‘मैं क्यों थकने लगी? दस-दस कोस का रोज चक्कर लगाती रही, तब तो थकी ही नहीं।’ सुर्ख सखी – ‘ओफ, उन दिनों भी कितना दौड़ना पड़ा था। कभी इधर तो कभी उधर, कभी जाओ तो कभी आओ।’ सब्ज सखी – ‘आखिर कुमार के ऐयार हम लोगों का पता नहीं ही लगा सके।’ सुर्ख सखी – ‘खुद ज्योतिषी जी की अक्ल चकरा गई, जो बड़े रम्माल और नजूमी कहलाते थे, दूसरों की
जाऊं क्योंकि मैं हर तरह हर दर्जे में उसके बराबर हूं। अगर इन दोनों बातों का इकरार आप न करेंगे तो कल ही मैं अपने घर का रास्ता लूंगी। सिवाय इसके यह भी कहे देती हूं कि बिना मेरी मदद के चाहे आप हजार बरस भी कोशिश करें मगर चंद्रकान्ता को नहीं पा सकते।” कुमार का इश्क वनकन्या पर पूरे दर्जे का था। चंद्रकान्ता से किसी तरह वनकन्या की चाह कम न थी, मगर इस खत को पढ़ने से उनको कई तरह की फिक्रों ने आ घेरा। सोचने लगे कि यह कैसे हो सकता है कि कुमारी से और इससे एक ही सायत में शादी हो, वह कब मंजूर करेगी