कौन कहे।’ वनकन्या – ‘ज्योतिषी जी के रमल को तो इन यंत्रों ने बेकार कर दिया, जो सिद्धनाथ बाबा ने हम लोगों के गले में डाल दिया है और अभी तक जिसे उतारने नहीं देते।’ सब्ज सखी – ‘मालूम नहीं इस ताबीज (यंत्र) में कौन-सी ऐसी चीज है जो रमल को चलने नहीं देती।’ वनकन्या – ‘मैंने यही बात एक दफा सिद्धनाथ बाबा जी से पूछी थी, जिसके जवाब में वे बहुत कुछ बक गए। मुझे सब तो याद नहीं कि क्या-क्या कह गए, हाँ, इतना याद है कि रमल जिस धातु से बनाई जाती है और रमल के साथी ग्रह, राशि, नक्षत्र, तारों वगैरह के असर पड़ने वाली जितनी धातुएँ हैं, उन सभी को एक साथ मिला कर यह यंत्र बनाया गया है इसलिए जिसके पास यह रहेगा, उसके बारे में कोई नजूमी या ज्योतिषी रमल के जरिए से कुछ नहीं देख सकेगा।’ सुर्ख सखी – ‘बेशक इसमें बहुत कुछ असर है। देखिए मैं सूरजमुखी बन कर गई थी, तब भी ज्योतिषी जी रमल
और महाराज जयसिंह ही कब इस बात को मानेंगे! सिवाय इसके यहां यह भी लिखा है कि बिना मेरी मदद के आप चंद्रकान्ता से नहीं मिल सकते, यह क्या बात है? खैर सो सब जो भी हो वनकन्या के बिना मेरी जिंदगी मुश्किल है, मैं जरूर उसके लिखे मुताबिक इकरारनामा लिख दूंगा पीछे समझा जायगा। कुमारी चंद्रकान्ता मेरी बात जरूर मान लेगी। देवीसिंह और ज्योतिषीजी को भी कुमार ने वह खत दिखाई। वे लोग भी हैरान थे कि वनकन्या ने यह क्या लिखा और इसका जवाब क्या देना चाहिए। दिन और रात भर कुमार इसी सोच में रहे कि इस खत का क्या जवाब दिया जाय।