से न बता सके कि यह ऐयार है।’ वनकन्या – ‘कुमार तो खूब ही छके होंगे?’ सुर्ख सखी – ‘कुछ न पूछिए, वे बहुत ही घबराए कि यह शैतान कहाँ से आई और क्या शर्त करा के अब क्या चाहती है?’ सब्ज सखी – ‘उसी के थोड़ी देर पहले मैं प्यादा बन कर खत का जवाब लेने गई थी और देवीसिंह को चेला बनाया था। यह कोई नहीं कह सका कि इसे मैं पहचानता हूँ।’ सुर्ख सखी – यह सब तो हुई मगर किस्मत भी कोई भारी चीज है। देखिए जब शिवदत्त के ऐयारों ने तिलिस्मी किताब चुराई थी और जंगल में ले जा कर जमीन के अंदर गाड़ रहे थे, उसी वक्त इत्तिफाक से हम लोगों ने पहुँच कर दूर से देख लिया कि कुछ गाड़ रहे हैं, उन लोगों के जाने के बाद खोद कर देखा तो तिलिस्मी किताब है। वनकन्या – ‘ओफ, बड़ी मुश्किल से सिद्धनाथ ने हम लोगों को घूमने का हुक्म दिया था, इस पर भी कसम दे दी थी कि दूर-दूर से कुमार को देखना, पास मत


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दूसरे दिन सुबह होते-होते तेजसिंह भी पंडित बद्रीनाथ ऐयार की गठरी पीठ पर लादे हुए आ पहुंचे। कुमार ने पूछा, “वापस क्यों आ गये?” तेज-क्या बतावें मामला ही बिगड़ गया। कुमार-सो क्या? तेज-तहखाने का दरवाजा नहीं खुलता। कुमार-किसी ने भीतर से तो बंद नहीं कर लिया। तेज-नहीं भीतर तो कोई ताला ही नहीं है। ज्यो-दो बातों में से एक बात जरूर है, या तो कोई नया आदमी पहुंचा जिसने दरवाजा खोलने की कल बिगाड़ दी, या फिर महाराज शिवदत्त ने भीतर से कोई चालाकी की। तेज-भला शिवदत्त अंदर


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