जाना।’ सुर्ख सखी – ‘इसमें तुम्हारा ही फायदा था, बेचारे सिद्धनाथ कुछ अपने वास्ते थोड़े ही कहते थे।’ वनकन्या – ‘यह सब सच है, मगर क्या करें बिना देखे जी जो नहीं मानता।’ सब्ज सखी – ‘हम दोनों को तो यही हुक्म दे दिया था कि बराबर घूम-घूम कर कुमार की मदद किया करो। मालिन रूपी बद्रीनाथ से कैसा बचाया था।’ सुर्ख सखी – ‘क्या ऐयार लोग पता लगाने की कम कोशिश करते थे? मगर यहाँ तो ऐयारों के गुरुघंटाल सिद्धनाथ हरदम मदद पर थे, उनके किए हो क्या सकता था? देखो गंगा जी में नाव के पास आते वक्त तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषी जी कैसा छके, हम लोगों ने सभी कपड़े तक ले लिए।’ सब्ज सखी – हम लोग तो जान-बूझ कर उन लोगों को अपने साथ लाए ही थे।’ वनकन्या – ‘चाहे वे लोग कितने ही तेज हों, मगर हमारे सिद्धनाथ को नहीं पा सकते। हाँ, उन लोगों में तेजसिंह बड़ा चालाक है।’ सुर्ख सखी – ‘तेजसिंह
से बंद करके अपने को और बला में क्यों फंसावेंगे? इसमें तो उनका हर्ज ही है कुछ फायदा नहीं। कुमार-कहीं वनकन्या ने तो कोई तरकीब नहीं की। तेज-आप भी गजब करते हैं, कहां बेचारी वनकन्या कहां वह तिलिस्मी तहखाना! कुमार-तुमको मालूम ही नहीं। उसने मुझे खत लिखी है कि-बिना मेरी मदद के तुम चंद्रकान्ता से नहीं मिल सकते। और भी दो बातें लिखी हैं। मैं इसी सोच में था कि क्या जवाब दूं और वह कौन-सी बात है जिसमें मुझको वनकन्या की मदद की जरूरत पड़ेगी, मगर अब तुम्हारे लौट आने से शक पैदा होता है। देवी-मुझे भी कुछ