बहुत चालाक हैं तो क्या हुआ, मगर हमारे सिद्धनाथ तेजसिंह के भी बाप हैं।’ वनकन्या – (हँस कर) ‘इसका हाल तो तुम ही जानो।’ सुर्ख सखी – ‘आप तो दिल्लगी करती हैं।’ सब्ज सखी – ‘हकीकत में सिद्धनाथ ने कुमार और उनके ऐयारों को बड़ा भारी धोखा दिया। उन लोगों को इस बात का ख्याल तक न आया कि इस खोह वाले तिलिस्म को सिद्धनाथ बाबा हम लोगों के हाथ फतह करा रहे हैं।’ सुर्ख सखी – ‘जब हम लोग अंदर से इस खोह का दरवाजा बंद कर तिलिस्म तोड़ रहे थे तब तेजसिंह, बद्रीनाथ की गठरी ले कर इसमें आए थे, मगर दरवाजा बंद पाकर लौट गए।’ वनकन्या – ‘बड़ा ही घबराए होंगे कि अंदर से इसका दरवाजा किसने बंद कर दिया?’ सुर्ख सखी – ‘जरूर घबराए होंगे। इसी में क्या और कई बातों में हम लोगों ने कुमार और उनके ऐयारों को धोखा दिया था। देखिए मैं उधर सूरजमुखी बन कर कह आई कि शिवदत्त को छुड़ा दूँगी
उन्हीं का बखेड़ा मालूम होता है। तेज-अगर वनकन्या को हमारे साथ कुछ फसाद करना होता तो तिलिस्मी किताब क्यों वापस देती? देखिये उस खत में क्या लिखा है जो किताब के साथ आया था। ज्यो-यह भी तुम्हारा कहना ठीक है। तेज-(कुमार से) भला वह खत तो दीजिए जिसमें वनकन्या ने यह लिखा है कि बिना हमारी मदद के चंद्रकान्ता से मुलाकात नहीं हो सकती। कुमार ने वह खत तेजसिंह के हाथ में दे दी, पढ़कर तेजसिंह बड़े सोच में पड़ गये कि यह क्या बात है, कुछ अक्ल काम नहीं करती। कुमार ने कहा, “तुम लोग यह जानते ही हो कि वनकन्या