और इधर इस बात की कसम खिला कर कि कुमार से दुश्मनी न करेगा, शिवदत्त को छोड़ दिया। उन लोगों ने भी जरूर सोचा होगा कि सूरजमुखी कोई भारी शैतान है।’ वनकन्या – ‘मगर फिर भी हरामजादे शिवदत्त ने धोखा दिया और कुमार से दुश्मनी करने पर कमर बाँधी, उसके कसम का कोई एतबार नहीं।’ सुर्ख सखी – ‘इसी से फिर हम लोगों ने गिरफ्तार भी तो कर लिया और तिलिस्मी किताब पा कर फिर कुमार को दे दी। हाँ, क्रूरसिंह ने एक दफा हम लोगों को पहचान लिया था। मैंने सोचा कि अब अगर यह जीता बचा तो सब भंडा फूट जाएगा, बस लड़ ही तो गई। आखिर मेरे हाथ से उसकी मौत लिखी थी, मारा गया।’ सब्ज सखी – ‘उस मुए को धुन सवार थी कि हम ही तिलिस्म फतह करके खजाना ले लें।’ वनकन्या – ‘मुझको तो इसी बात की खुशी है यह खोह वाला तिलिस्म मेरे हाथ से फतह हुआ।’ सुर्ख सखी – ‘इसमें काम ही कितना था, इस पर सिद्धनाथ
की मुहब्बत मेरे दिल में कैसा असर कर गई है, बिना देखे एक घड़ी चैन नहीं पड़ता, तो फिर उसके लिखे बमूजिब इकरारनामा लिख देने में क्या हर्ज है, जब वह खुश होगी तो उससे जरूर ही कुछ न कुछ भेद मिलेगा।” तेज-जो मुनासिब समझिये कीजिए, चंद्रकान्ता बेचारी तो कुछ न बोलेगी मगर महाराज जयसिंह यह कब मंजूर करेंगे कि एक ही मड़वे में दोनों के साथ शादी हो। क्या जाने वह कौन, कहां की रहने वाली और किसकी लड़की है? कुमार-उसकी खत में तो यह भी लिखा है कि ‘मैं किसी तरह रुतबे में कुमारी से कम नहीं हूं।’ ये बातें हो ही