किया – ‘जिस वक्त सिद्धनाथ योगी ने मुझे आप लोगों को लाने के लिए भेजा था उस वक्त यह भी कह दिया था कि जब वे लोग इस खोह के पास पहुँच जाएँ, तब अगर हुक्म दें तो तुम उन लोगों को छोड़ कर पहले अकेले आ कर हमसे मिल जाना।, अब आप कहें तो योगी जी के कहे मुताबिक पहले मैं उनसे जा कर मिल आऊँ।’ महाराज जयसिंह और राजा सुरेंद्रसिंह ने कहा – ‘योगी जी की बात जरूर माननी चाहिए, तुम जाओ उनसे मिल कर आओ, तब तक हमारा डेरा भी इसी जंगल में पड़ता है।’ कुँवर वीरेंद्रसिंह अकेले सिर्फ तेजसिंह को साथ ले कर खोह में गए। जिस तरह हम पहले लिख आए हैं उसी तरह खोह का दरवाजा खोल कई कोठरियों, मकानों और बागों में घूमते हुए दोनों आदमी उस बाग में पहुँचे जिसमें सिद्धनाथ रहते थे या जिसमें कुमारी चंद्रकांता की तस्वीर का दरबार कुमार ने देखा था। बाग के अंदर पैर रखते ही सिद्धनाथ योगी से मुलाकात हुई जो दरवाजे के पास
आई है। बांका-मैं तो स्वयं मौत हूं। देवी-इस बेअदबी का मजा चखाऊं तुझको? बांका-मैं कुछ ऐसे-वैसे का भेजा नहीं आया हूं, मुझको उसने भेजा है जिसको तुम दिन में साढ़े सत्रह दफा झुककर सलाम करोगे। देवीसिंह और कुछ कहा ही चाहते थे कि तेजसिंह ने रोक दिया और कहा, “चुप रहो, मालूम होता है यह कोई ऐयार या मसखरा है, तुम खुद ऐयार होकर जरा दिल्लगी में रंज हो जाते हो! बांका-अगर अब भी न समझोगे तो समझाने के लिए मैं चंपा को बुला लाऊंगा। उस बांके-टेढ़े जवान की बात पर सब लोग एकदम हंस