से उसे गिरफ्तार किया। खूब हुआ जो वे लोग मारे गए, अब उनके संगी-साथियों का दोनों राजों से दुश्मनी करने का हौसला न पड़ेगा। आओ टहलते-टहलते हम लोग बात करें।’ कुमार – ‘बहुत अच्छा।’ तेजसिंह – ‘जब आपको यह सब मालूम है तो यह भी जरूर मालूम होगा कि जालिम खाँ कौन था?’ सिद्धनाथ – ‘यह तो नहीं मालूम कि वह कौन था मगर अंदाज से मालूम होता है कि शायद नाजिम और अहमद के रिश्तेदारों में से कोई होगा।’ कुमार – ‘ठीक है, जो आप सोचते हैं वही होगा।’ सिद्धनाथ – ‘महाराज शिवदत्त तो जंगल में चले गए?’ कुमार – ‘जी हाँ, वे तो हमारे पिता से कह गए हैं कि अब तपस्या करेंगे।’ सिद्धनाथ – ‘जो हो मगर दुश्मन का विश्वास कभी नहीं करना चाहिए।’ कुमार – ‘क्या वह फिर दुश्मनी पर कमर बाँधेगे ?’ सिद्धनाथ – ‘कौन ठिकाना?’ कुमार – ‘अब हुक्म हो तो बाहर जा कर
करते भी मगर तुमसे क्या?ऐयार हो तो, मसखरे हो तो, इसमें कोई शक नहीं कि दोस्त के आदमी हो।” यह सुन उसने झुककर सलाम किया और कुमार की तरफ देखकर कहा, “मुझको जवाब मिल जाय क्योंकि बड़ी दूर जाना है।” कुमार ने उसी खत की पीठ पर यह लिख दिया, “मुझको सब-कुछ दिलोजान से मंजूर है।” बाद इसके अपनी अंगूठी से मोहर कर उस बांके जवान के हवाले किया, वह खत लेकर खेमे के बाहर हो गया। चन्द्रकान्ता ( तीसरा भाग : सातवां बयान) आज तेजसिंह के वापस आने और बांके-तिरछे जवान के पहुंचकर बातचीत करने