लगे। आखिर कुमारी का हाथ पकड़ चंपा बोली – ‘कुमारी, तुम तो कहती थीं कि कुमार जिस रोज मिलेंगे उनसे पूछूँगी कि वनकन्या किसका नाम रखा था? वह कौन औरत है? उससे क्या वादा किया है? अब किसके साथ शादी करने का इरादा है? क्या वे सब बातें भूल गईं, अब इनसे न कहोगी?’ किसी तरह किसी की लौ तभी तक लगी रहती है जब तक कोई दूसरा आदमी किसी तरह की चोट उसके दिमाग पर न दे और उसके ध्यान को छेड़ कर न बिगाड़े, इसीलिए योगियों को एकांत में बैठना कहा है। कुँवर वीरेंद्रसिंह और कुमारी चंद्रकांता की मुहब्बत बाजारू न थी, वे दोनों एक रूप हो रहे थे, दिल ही दिल में अपनी जुदाई का सदमा एक ने दूसरे से कहा और दोनों समझ गए मगर किसी पास वाले को मालूम न हुआ, क्योंकि जुबान दोनों की बंद थी। हाँ, चंपा की बात ने दोनों को चौंका दिया, दोनों की चार आँखें जो मिल-जुल कर एक हो रही थीं हिल-डुल कर नीचे की तरफ हो गईं और सिर नीचा किए हुए
तब वह फिर बोली, “मैं उस वनकन्या का पूरा पता आपको दे सकती हूं और एक तरकीब ऐसी बता सकती हूं कि आप घड़ी भर में बिल्कुल तिलिस्म तोड़कर कुमारी चंद्रकान्ता से जा मिलें।” बुङ्ढी की बात सुनकर सब खुश हो गये। कुमार ने कहा, “अगर ऐसा ही है तो जल्द बता कि वह वनकन्या कौन है और घड़ी भर में तिलिस्म कैसे टूटेगा?” बुङ्ढी-पहले मेरे इनाम की बात तो कर लीजिए। कुमार-अगर तेरी बात सच हुई तो जो कहेगी वही इनाम मिलेगा। बुङ्ढी-तो इसके लिए कसम खाइये। कुमार-अच्छा क्या इनाम लेगी, पहले यह तो सुन लूं।