चन्द्रकान्ता ( पहला भाग : नौवां बयान) वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह बाग के बाहर से अपने खेमे की तरफ रवाना हुए। जब खेमे में पहुंचे तो आधी रात बीत चुकी थी, मगर तेजसिंह को कब चैन पड़ता था, वीरेन्द्रसिंह को पहुंचाकर फिर लौटे और अहमद की सूरत बना क्रूरसिंह के मकान पर पहुंचे। क्रूरसिंह चुनार की तरफ रवाना हो चुका था, जिन आदमियों को घर में हिफाजत के लिए छोड़ गया था और कह गया था कि अगर महाराज पूछें तो कह देना बीमार है, उन लोगों ने एकाएक अहमद को देखा तो ताज्जुब से पूछा, ‘‘कहो अहमद, तुम कहाँ थे अब तक?’’ नकली अहमद ने कहा, ‘‘मैं जहन्नुम की सैर करने गया था, अब लौटकर आया हूँ। यह बताओ कि क्रूरसिंह कहाँ है?’’ सभी ने उसको पूरा-पूरा हाल सुनाया और कहा, ‘‘अब चुनार गये हैं, तुम भी वहीं जाते तो अच्छा होता !’’ अहमद ने कहा, ‘‘हाँ मैं भी जाता हूँ, अब घर न जाऊंगा। सीधे चुनार


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हैं, मर गये, इस समय सिवाय मेरे कोई नहीं जानता, और मैं तुमको इसका खोलना बतलाये देता हूँ। इसका खोलना बतलाये देता हूँ। जिस-जिस को मैं पकड़ कर लाया करूँगा इसी जगह लाकर कैद किया करूँगा जिससे किसी को मालूम न हो और कोई छुड़ा के भी न ले जा सके। इसके अन्दर कैद करने से कैदियों के हाथ-पैर बांधने की जरूरत नहीं रहेगी, सिर्फ हिफाजत के लिए एक खुलासी बेड़ी उनके पैरों में डाल देनी पड़ेगी जिससे वह धीरे-धीरे चल-फिर सकें। कैदियों के खाने-पीने की भी फिक्र तुमको नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि इसके अन्दर एक छोटी-सी कुदरती नहर है जिसमें बराबर


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