आए। दूर से सिद्धनाथ बाबा दिखाई पड़े, जिन्होंने कुमार को अपने पास बुला कर कहा – ‘कुमार, हमने तुमको यह नहीं कहा था कि दिन भर चंद्रकांता के पास बैठे रहो। दोपहर होने वाली है, जिन लोगों को खोह के बाहर छोड़ आए हो वे बेचारे तुम्हारी राह देखते होंगे।’ कुमार – ‘(सूरज की तरफ देख कर) जी हाँ दिन तो… ।’ बाबा – ‘दिन तो क्या?’ कुमार – (सकपकाए-से हो कर) ‘देर तो जरूर कुछ हो गई, अब हुक्म हो तो जा कर अपने पिता और महाराज जयसिंह को जल्दी से ले आऊँ?’ बाबा – ‘हाँ जाओ, उन लोगों को यहाँ ले आओ। मगर मेरी तरफ से दोनों राजाओं को कह देना कि इस खोह के अंदर उन्हीं लोगों को अपने साथ लाएँ जो कुमारी चंद्रकांता को देख सकें या जिसके सामने वह हो सके।’ कुमार – ‘बहुत अच्छा।’ बाबा – ‘जाओ अब देर न करो।’ कुमार – ‘प्रणाम करता हूँ।’ बाबा – ‘इसकी कोई जरूरत नहीं,
बुङ्ढी की पूरी दुर्गति कर देते। तेजसिंह ने ज्योतिषीजी से पूछा, “आप बताइए यह कोई ऐयार है या सचमुच जैसी दिखाई देती है वैसी ही है? अगर कुमार कसम न खाये होते तो हम लोग किसी तरकीब से मालूम कर ही लेते।” ज्योतिषीजी ने अपनी नाक पर हाथ रखकर स्वांस का विचार करके कहा, “यह ऐयार नहीं है, जो देखते हो वही है।” अब तो तेजसिंह और भी बिगड़े,बुङ्ढी से कहा, “बस तू यहां से चली जा, हम लोग कुमार के कसम खाने को पूरा कर चुके कि तुझे कुछ न कहा, अगर अब जाने में देर करेगी तो कुत्तो से नुचवा डालूगा। क्या तमाशा है!