करते थे। घुमाते-फिराते कई ताज्जुब की चीजों को दिखाते और कुछ हाल समझाते, सभी को साथ लिए हुए तेजसिंह उस बाग के दरवाजे पर पहुँचे, जिसमें सिद्धनाथ रहते थे। इन लोगों के पहुँचने के पहले ही से सिद्धनाथ इस्तकबाल (अगुवानी) के लिए द्वार पर मौजूद थे। तेजसिंह ने महाराज जयसिंह और सुरेंद्रसिंह को उँगली के इशारे से बता कर कहा – ‘देखिए सिद्धनाथ बाबा दरवाजे पर खड़े हैं।’ दोनों राजा चाहते थे कि जल्दी से पास पहुँच कर बाबा जी को दंडवत करें मगर इसके पहले ही बाबा जी ने पुकार कर कहा – ‘खबरदार, मुझे कोई दंडवत न करना नहीं तो पछताओगे और मुलाकात भी न होगी।’ इरादा करते रह गए, किसी की मजाल न हुई कि दंडवत करता। महाराज जयसिंह और राजा सुरेंद्रसिंह हैरान थे कि बाबा जी ने दंडवत करने से क्यों रोका। पास पहुँच कर हाथ मिलाना चाहा, मगर बाबा जी ने इसे भी मंजूर न करके कहा – ‘महाराज, मैं इस
कभी इस बुङ्ढी चुड़ैल की बातों पर जो अभी शादी करने आई थी अफसोस और गम करते रहे। तबीयत बिल्कुल उदास थी। आखिर दिन बीत गया और शाम हुई। कुमार ने फतहसिंह को बुलाया, जब वे आये तो पूछा, “तेजसिंह कहां हैं?” उन्होंने जवाब दिया, “कुछ मालूम नहीं, ज्योतिषीजी को साथ लेकर कहीं गये हैं?” चन्द्रकान्ता ( तीसरा भाग : आठवां बयान) देवीसिंह उस बुङ्ढी के पीछे रवाना हुए। जब तक दिन बाकी रहा बुङ्ढी चलती गई। उन्होंने भी पीछा न छोड़ा। कुछ रात गये तक वह चुडैल एक छोटे से पहाड़ के दर्रे में पहुंची जिसके दोनों तरफ ऊंची-ऊंची