लायक नहीं, आपका दर्जा मुझसे बहुत बड़ा है।’ सुरेंद्र – ‘साधुओं से बढ़ कर किसी का दर्जा नहीं हो सकता।’ बाबा जी – आपका कहना बहुत ठीक है, मगर आपको मालूम नहीं कि मैं किस तरह का साधु हूँ।’ सुरेंद्र – ‘साधु चाहे किसी तरह का हो पूजने ही योग्य है।’ बाबा जी – ‘किसी तरह का हो, मगर साधु हो तब तो।’ सुरेंद्र – ‘तो आप कौन हैं?’ बाबा जी – ‘कोई भी नहीं।’ जयसिंह – ‘आपकी बातें ऐसी हैं कि कुछ समझ ही में नहीं आतीं और हर बात ताज्जुब, आश्चर्य, सोच और घबराहट बढ़ाती है।’ बाबा जी – (हँस कर) ‘अच्छा आइए इस बाग में चलिए।’ सभी को अपने साथ लिए सिद्धनाथ बाग के अंदर गए। पाठक, घड़ी-घड़ी बाग की तारीफ करना तथा हर एक गुल-बूटे और पत्तियों की कैफियत लिखना मुझे मंजूर नहीं, क्योंकि इस छोटे से ग्रंथ को शुरू से इस वक्त तक मुख्तसर ही में लिखता चला
पहाड़ियां थीं। थोड़ी दूर इस दर्रे के अंदर जा वह एक खोह में घुस गई जिसका मुंह बहुत छोटा, सिर्फ एक आदमी के जाने लायक था। देवीसिंह ने समझा शायद यही इसका घर होगा, यह सोच पेड़ के नीचे बैठ गये। रात भर उसी तरह बैठे रह गये मगर फिर वह बुढ़िया उस खोह में से बाहर न निकली। सबेरा होते ही देवीसिंह भी उसी खोह में घुसे। उस खोह के अंदर बिल्कुल अंधकार था, देवीसिंह टटोलते हुए चले जा रहे थे। अगल-बगल जब हाथ फैलाते तो दीवार मालूम पड़ती जिससे जाना जाता कि यह खोह एक सुरंग के तौर पर है, इसमें कोई