ही बिछा हुआ था, इसके बाद बातचीत होने लगी। बाबा जी – (महाराज जयसिंह और राजा सुरेंद्रसिंह की तरफ देख कर) ‘आप लोग कुशल से तो हैं।’ दोनों राजा – ‘आपकी कृपा से बहुत आनंद है, और आज तो आपसे मिल कर बहुत प्रसन्नता हुई।’ बाबा जी – ‘आप लोगों को यहाँ तक आने में तकलीफ हुई, उसे माफ कीजिएगा।’ जयसिंह – ‘यहाँ आने के ख्याल ही से हम लोगों की तकलीफ जाती रही। आपकी कृपा न होती और यहाँ तक आने की नौबत न पहुँचती तो, न मालूम कब तक कुमारी चंद्रकांता के वियोग का दु:ख हम लोगों को सहना पड़ता।’ बाबा जी – (मुस्कराकर) ‘अब कुमारी की तलाश में आप लोग तकलीफ न उठाएँगे।’ जयसिंह – ‘आशा है कि आज आपकी कृपा से कुमारी को जरूर देखेंगे।’ बाबा जी – ‘शायद किसी वजह से अगर आज कुमारी को देख न सकें तो कल जरूर आप लोग उससे मिलेंगे। इस वक्त आप लोग स्नान-पूजा से
गई, अब उसका पता लगाना मुश्किल है। फिर इसी सुरंग की राह से फिरना पड़ा क्योंकि ऊपर से जंगल-जंगल लश्कर में जाने की राह मालूम नहीं, कहीं ऐसा न हो कि भूल जायं तो और भी खराबी हो, बड़ी भूल हुई कि रात को बुङ्ढी के पीछे-पीछे हम भी इस सुरंग में न घुसे,मगर यह क्या मालूम था कि इस सुरंग में दूसरी तरफ निकल जाने के लिए रास्ता है। देवीसिंह मारे गुस्से के दांत पीसने लगे मगर कर ही क्या सकते थे? बुङ्ढी तो मिली नहीं कि कसर निकालते, आखिर लाचार हो उसी सुरंग की राह से वापस हुए और शाम होते-होते लश्कर में पहुंचे। कुमार